दोहा-दशक

4. अभ्यासमाला : प्रश्नोत्तर

1. सही विकल्प का चयन करो :

(क) कवि बिहारीलाल किस काल के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं ?
(1) आदिकाल के (2) रीतिकाल के (3) भक्तिकाल के (4) आधुनिक काल के

  • उत्तर: (2) रीतिकाल के

(ख) कविवर बिहारी की काव्य-प्रतिभा से प्रसन्न होने वाले मुगल सम्राट थे —
(1) औरंगजेब (2) अकबर (3) शाहजहाँ (4) जहाँगीर

  • उत्तर: (3) शाहजहाँ

(ग) कवि बिहारी का देहावसान कब हुआ ?
(1) 1645 ई. को (2) 1660 ई. को (3) 1662 ई. को (4) 1663 ई. को

  • उत्तर: (4) 1663 ई. को

(घ) श्रीकृष्ण के सिर पर क्या शोभित है ?
(1) मुकुट (2) पगड़ी (3) टोपी (4) चोटी

  • उत्तर: (1) मुकुट

(ङ) कवि बिहारी ने किन्हें सदा साथ रहने वाली संपत्ति माना है ?
(1) राधा को (2) श्रीराम को (3) यदुपति कृष्ण को (4) लक्ष्मी को

  • उत्तर: (3) यदुपति कृष्ण को

2. निम्नलिखित कथन शुद्ध हैं या अशुद्ध, बताओ :

(क) हिन्दी के समस्त कवियों में भी बिहारीलाल अग्रिम पंक्ति के अधिकारी हैं।

  • उत्तर: शुद्ध

(ख) कविवर बिहारी को संस्कृत और प्राकृत के प्रसिद्ध काव्य-ग्रंथों के अध्ययन का अवसर प्राप्त नहीं हुआ था।

  • उत्तर: अशुद्ध (उन्हें महन्त नरहरिदास के यहाँ अध्ययन का पूरा अवसर प्राप्त हुआ था)

(ग) 1645 ई. के आस-पास कवि बिहारी वृत्ति लेने जयपुर पहुँचे थे।

  • उत्तर: शुद्ध

(घ) कवि बिहारी के अनुसार ओछा व्यक्ति भी बड़ा बन सकता है।

  • उत्तर: अशुद्ध (ओछा व्यक्ति कभी बड़ा नहीं बन सकता)

(ङ) कवि बिहारी का कहना है कि दुर्दशाग्रस्त होने पर भी धन का संचय करते रहना कोई नीति नहीं है।

  • उत्तर: शुद्ध

3. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो :

(क) कवि बिहारी ने मुख्य रूप से कैसे दोहों की रचना की है ?

  • उत्तर: कवि बिहारी ने मुख्य रूप से प्रेम-श्रृंगार और गौण रूप से भक्ति एवं नीति के दोहों की रचना की है।

(ख) कविवर बिहारी किनके आग्रह पर जयपुर में ही रुक गए ?

  • उत्तर: कविवर बिहारी जयपुर के महाराज जयसिंह और चौहानी रानी के आग्रह पर जयपुर में ही रुक गए।

(ग) कवि बिहारी की ख्याति का एकमात्र आधार-ग्रंथ किस नाम से प्रसिद्ध है ?

  • उत्तर: कवि बिहारी की ख्याति का एकमात्र आधार-ग्रंथ ‘बिहारी सतसई’ के नाम से प्रसिद्ध है।

(घ) किसमें किससे सौ गुनी अधिक मादकता होती है ?

  • उत्तर: कनक (सोने / धन-दौलत) में कनक (धतूरे) से सौ गुनी अधिक मादकता (नशा) होती है।

(ङ) कवि ने गोपीनाथ कृष्ण से क्या-क्या न गिनने की प्रार्थना की है ?

  • उत्तर: कवि ने गोपीनाथ कृष्ण से अपने गुण और अवगुणों (दोषों) के समूहों को न गिनने की प्रार्थना की है।

4. अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्दों में) :

(क) किस परिस्थिति में कविवर बिहारी काव्य-रचना के लिए जयपुर में ही रुक गए थे ?

  • उत्तर: जब 1645 ई. में बिहारी जयपुर पहुँचे, तो महाराज जयसिंह और चौहानी रानी के विशेष आग्रह तथा प्रत्येक दोहे की रचना पर एक अशर्फी (स्वर्ण मुद्रा) देने की शर्त पर वे वहाँ रुक गए।

(ख) ‘यहि बानक मो मन बसौ, सदा बिहारीलाल’ का भाव क्या है ?

  • उत्तर: इसका भाव यह है कि सिर पर मुकुट, कमर में पीताम्बर, हाथ में मुरली और वक्षस्थल पर वैजयंती माला धारण किए हुए श्रीकृष्ण की यह मनमोहक छवि कवि के हृदय में सदैव बसी रहे।

(ग) ‘ज्यों-ज्यों बूड़ै स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जलु होई’ का आशय स्पष्ट करो।

  • उत्तर: इसका आशय यह है कि ईश्वर-प्रेमी का मन जैसे-जैसे श्यामवर्ण (काले रंग) के श्रीकृष्ण की भक्ति में गहरा डूबता जाता है, वैसे-वैसे वह विकारों और पापों से मुक्त होकर उतना ही उज्ज्वल, पवित्र और निर्मल होता जाता है।

(घ) ‘आँटे पर प्रानन हरै, काँटे लौं लगि पाय’ के जरिए कवि क्या कहना चाहते हैं ?

  • उत्तर: कवि कहना चाहते हैं कि दुर्जन (दुष्ट) व्यक्ति का स्वभाव काँटे जैसा होता है। वह पहले पाँव में पड़कर (झुककर) चापलूसी करता है, किंतु अवसर मिलते ही काँटे की तरह चुभकर प्राण ले लेता है।

(ङ) ‘मन काँचै नाचै बृथा, साँचै राँचै राम’ – का तात्पर्य बताओ।

  • उत्तर: इसका तात्पर्य यह है कि जब तक मन कच्चा (चंचल, वासनायुक्त और कपटी) रहता है, तब तक बाह्य आडंबर व्यर्थ नाचते हैं। ईश्वर (राम) केवल सच्चे, निर्मल और निष्कपट हृदय में ही प्रसन्न होकर निवास करते हैं।

5. संक्षेप में उत्तर दो (लगभग 50 शब्दों में) :

(क) कवि के अनुसार अनुरागी चित्त का स्वभाव कैसा होता है ?

  • उत्तर: कवि बिहारी के अनुसार कृष्ण-प्रेम में डूबे अनुरागी (भक्त) चित्त की गति बहुत विचित्र और अलौकिक होती है। सामान्यतः किसी काली वस्तु में डूबने से रंग काला होता है, किंतु यह मन जैसे-जैसे श्याम (काले) रंग के श्रीकृष्ण के प्रेम में गहरा डूबता है, वैसे-वैसे अज्ञान और पापों से मुक्त होकर अत्यंत उज्ज्वल, निर्मल और पवित्र होता जाता है।

(ख) सज्जन का स्नेह कैसा होता है ?

  • उत्तर: सज्जन (सत्पुरुषों) का प्रेम मंजीठ (चोल) के पक्के लाल रंग के समान अत्यंत गहरा और स्थायी होता है। जिस प्रकार मंजीठ के रंग से रँगा वस्त्र पुराना होकर भले ही फट जाए, पर उसका रंग कभी फीका नहीं पड़ता; उसी प्रकार सज्जनों के प्रेम में विपत्ति या प्रतिकूलता आने पर भी कभी कोई कमी या फीकापन नहीं आता।

(ग) धन के संचय के संदर्भ में कवि ने कौन-सा उपदेश दिया है ?

  • उत्तर: कवि बिहारी कहते हैं कि मित्रों और परिजनों की दुर्दशा करके धन का अनावश्यक संचय (जोड़ना) करना कोई बुद्धिमानी या नीति नहीं है। यदि खाने-पीने और आवश्यक कार्यों पर खर्च करने के बाद धन बचे, तब करोड़ों रुपये भी अवश्य जोड़ने चाहिए, किंतु कंजूसी करके अपनों को कष्ट देना अनुचित है।

(घ) दुर्जन के स्वभाव के बारे में कवि ने क्या कहा है ?

  • उत्तर: कवि कहते हैं कि दुर्जन (दुष्ट) व्यक्ति यदि अचानक अत्यधिक नम्र होकर मीठी बातें करने लगे, तो भी उस पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। दुर्जन का स्वभाव काँटे के समान होता है, जो पाँव में पड़कर (झुककर) अंततः गहरा घाव करता है और अवसर मिलते ही प्राण हर लेता है।

(ङ) कवि बिहारी किस वेश में अपने आराध्य कृष्ण को मन में बसा लेना चाहते हैं ?

  • उत्तर: कवि बिहारी श्रीकृष्ण के उस दिव्य रूप को अपने मन में बसाना चाहते हैं जिसके सिर पर मोरपंख का मुकुट सुशोभित हो, कमर में पीताम्बर (काछनी) बंधी हो, हाथों में मनमोहक मुरली हो और वक्षस्थल पर वैजयंती माला लटक रही हो।

(च) अपने उद्धार के प्रसंग में कवि ने गोपीनाथ कृष्णजी से क्या निवेदन किया है ? 

  • उत्तर: अपने उद्धार के प्रसंग में कवि बिहारी ने श्रीकृष्ण से करुणापूर्वक प्रार्थना की है कि हे गोपीनाथ! आप मेरे गुण-दोषों की गिनती मत कीजिए। जिस प्रकार आपने पूर्व में बड़े-बड़े पापियों (पतितों) का उद्धार बिना उनके कर्मों की गिनती किए कर दिया था, उसी प्रकार अपनी पतित-पावन कृपा से मेरा भी भवसागर से उद्धार कर दीजिए।

(छ) कवि बिहारी की लोकप्रियता पर एक संक्षिप्त टिप्पणी प्रस्तुत करो।

  • उत्तर: कवि बिहारी रीतिकाल के सर्वाधिक लोकप्रिय एवं प्रतिष्ठित कवि हैं। उनकी एकमात्र रचना ‘बिहारी सतसई’ को श्रृंगार, भक्ति और नीति की त्रिवेणी कहा जाता है। उन्होंने दोहे जैसे छोटे से छंद में गूढ़ और विस्तृत भावों को भरने (‘गागर में सागर भरना’) का अनुपम कौशल दिखाया है। यूरोपीय विद्वान डॉ. ग्रियर्सन ने भी माना कि यूरोप में सतसई के समकक्ष कोई रचना नहीं है।

6. सम्यक् उत्तर दो (लगभग 100 शब्दों में) :

(क) कवि बिहारीलाल का साहित्यिक परिचय दो।

  • उत्तर: कविवर बिहारीलाल रीतिकाल की ‘रीतिसिद्ध’ काव्यधारा के मूर्धन्य कवि हैं। उनका जन्म 1595 ई. में ग्वालियर में हुआ।

  • रचना: उनकी अमर कीर्ति का आधार एकमात्र ग्रंथ ‘बिहारी सतसई’ है, जिसमें लगभग 700 दोहे संकलित हैं।

  • काव्य-विषय: बिहारी ने मुख्य रूप से प्रेम और श्रृंगार के संयोग व वियोग पक्षों का अत्यंत सूक्ष्म वर्णन किया है। साथ ही भक्ति और लोक-नीति के उत्कृष्ट दोहे रचे हैं।

  • भाषा एवं शैली: इनकी काव्य-भाषा साहित्यिक, प्रौढ़ और सुमधुर ब्रजभाषा है।

  • कला-पक्ष: बिहारी ने दोहा छंद में ‘गागर में सागर’ भरा है। इनके दोहों में रूपक, उपमा, श्लेष, यमक और विरोधाभास अलंकारों का चमत्कारी प्रयोग मिलता है। 1663 ई. में इनका देहावसान हुआ।

(ख) ‘बिहारी सतसई’ पर एक टिप्पणी लिखो।

  • उत्तर: ‘बिहारी सतसई’ हिन्दी साहित्य की एक अद्वितीय और कालजयी कृति है। यह 713 दोहों का एक मुक्तक काव्य-संग्रह है। इसे ‘श्रृंगार, भक्ति और नीति की त्रिवेणी’ कहा जाता है।

  1. श्रृंगार रस की प्रधानता: इसमें नायक-नायिका के नैन-बाण, चेष्टाओं और प्रेम-लीलाओं का सजीव चित्रण है।

  2. भक्ति एवं नीति का समन्वय: सतसई में कृष्ण-भक्ति, आत्म-समर्पण तथा जीवन में आचरण योग्य व्यावहारिक नीति के अनमोल रत्न भरे हैं।

  3. गागर में सागर: छोटे से दोहे में अत्यंत गूढ़ अर्थ समाहित करने की क्षमता के कारण ही कहा गया है— “सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर। देखन में छोटे लगै घाव करै गंभीर॥”

(ग) कवि बिहारी ने अपने भक्तिपरक दोहों के माध्यम से क्या कहा है ? पठित दोहों के आधार पर स्पष्ट करो।

  • उत्तर: ‘दोहा-दशक’ के प्रथम 5 भक्तिपरक दोहों में बिहारी ने सगुण कृष्ण-भक्ति और मन की पवित्रता का संदेश दिया है:

  1. वे कृष्ण के मुरलीधर, मुकुटधारी और पीताम्बर वेश को अपने हृदय में बसाना चाहते हैं।

  2. वे संसार की नश्वर धन-संपत्ति के स्थान पर संकटहर्ता यदुपति कृष्ण को ही अपनी वास्तविक व शाश्वत संपत्ति मानते हैं।

  3. कृष्ण के प्रेम में मन जितना गहरा डूबता है, उतना ही पवित्र और उज्ज्वल होता है।

  4. माला जपने, छापे लगाने और तिलक लगाने जैसे बाह्य पाखंडों को व्यर्थ बताकर वे सच्चे व निर्मल मन से राम की आराधना पर बल देते हैं।

  5. वे गोपीनाथ कृष्ण से अपने अवगुणों की गिनती न करके पतित-पावन भाव से उद्धार करने की प्रार्थना करते हैं।

(घ) पठित दोहों के आधार पर बताओ कि कवि बिहारी के नीतिपरक दोहों का प्रतिपाद्य क्या है ?

  • उत्तर: ‘दोहा-दशक’ के अंतिम 5 नीतिपरक दोहों में कवि बिहारी ने मानव-जीवन के व्यावहारिक आचरण, लोक-व्यवहार और नीतिगत मूल्यों का प्रतिपादन किया है:

  1. सच्ची मित्रता और सज्जनता: सज्जनों का प्रेम मंजीठ के पक्के रंग जैसा होता है, जो कभी फीका नहीं पड़ता।

  2. दुर्जन से सावधानी: दुर्जन के झुकने या मीठी बातों पर विश्वास नहीं करना चाहिए, वह काँटे की तरह घातक होता है।

  3. धन का नशा: सोने (कनक) का नशा धतूरे से सौ गुना अधिक घातक होता है, क्योंकि इसे पाने मात्र से मनुष्य अहंकारी और पागल हो जाता है।

  4. उचित धन-संचय: अपनों को कष्ट देकर धन जोड़ना अनुचित है; उपयोग और खर्च के बाद बचे धन का ही संचय करना चाहिए।

  5. ओछे व्यक्ति की सीमा: क्षुद्र और ओछा व्यक्ति कभी महान नहीं बन सकता, जैसे आँखें फाड़कर देखने से भी वे बड़ी नहीं हो जातीं।

7. सप्रसंग व्याख्या करो (लगभग 100 शब्दों में) :

(क) “कोऊ कोरिक संग्रहो, कोऊ लाख हजार। मो संपति जदुपति सदा, बिपति बिदारनहार ॥”

  • प्रसंग: प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आलोक (भाग-2)’ के ‘दोहा-दशक’ शीर्षक से उद्धृत है, जिसके रचयिता रीतिकाल के श्रेष्ठ कवि बिहारीलाल हैं। इसमें कवि ने सांसारिक धन की तुलना में भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति को ही अपनी सर्वोच्च संपत्ति घोषित किया है।

  • व्याख्या: कवि बिहारी कहते हैं कि इस संसार में कोई करोड़ों का धन संग्रह करे और कोई लाखों-हजारों की संपत्ति जमा करे; किंतु मेरे लिए तो मेरे एकमात्र आराध्य यदुपति भगवान श्रीकृष्ण ही मेरी सर्वोपरि संपत्ति हैं। वे समस्त संकटों और विपत्तियों को हरने वाले (विपत्ति-विदारनहार) हैं। सांसारिक धन नश्वर है, जबकि प्रभु की भक्ति शाश्वत और भवसागर से पार उतारने वाली है।

  • विशेष:

  1. अनन्य भक्ति और निर्लोभ भाव का सुंदर प्रकटीकरण।

  2. अनुप्रास अलंकार (‘कोऊ कोरिक’, ‘बिपति बिदारनहार’)।

  3. साहित्यिक ब्रजभाषा और दोहा छंद।

(ख) “जप-माला, छापैं, तिलक, सरै न एकौ कामु। मन काँचे नाचै वृथा, साँचै राँचै रामु ॥”

  • प्रसंग: प्रस्तुत नीति एवं भक्तिपरक दोहा रीतिकाल के प्रमुख कवि बिहारीलाल द्वारा रचित ‘दोहा-दशक’ से उद्धृत है। इसमें कवि ने धार्मिक बाह्याडंबरों और पाखंड का खंडन करते हुए मन की सच्ची भक्ति पर बल दिया है।

  • व्याख्या: कवि बिहारी स्पष्ट करते हैं कि हाथ में माला जपने, शरीर पर धार्मिक छापे लगाने और माथे पर तिलक लगाने जैसे बाहरी दिखावे से ईश्वर की प्राप्ति रूपी कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता। जब तक मन कच्चा (चंचल, वासनायुक्त और कपटी) रहता है, तब तक वह व्यर्थ ही आडंबरों में नाचता रहता है। इसके विपरीत, जिस व्यक्ति का हृदय सच्चा, निर्मल और निष्कपट होता है, उसी के सच्चे मन में भगवान राम (ईश्वर) प्रसन्न होकर निवास करते हैं।

  • विशेष:

  1. बाह्याडंबरों और पाखंड पर करारा प्रहार।

  2. ‘साँचै राँचै रामु’, ‘काँचे नाचै’ में सुंदर अंत्यानुप्रास अलंकार।

  3. कबीर दास की तरह खरी और दो-टूक बात कही गई है।

(ग) “कनक कनक तैं सौ गुनी, मादकता अधिकाइ। उहिं खाए बौराइ जगु, इहिं पाएँ बौराइ ॥”

  • प्रसंग: प्रस्तुत विश्वप्रसिद्ध दोहा कवि बिहारीलाल द्वारा रचित ‘दोहा-दशक’ (‘बिहारी सतसई’) से लिया गया है। इसमें धन-दौलत (स्वर्ण) के मद को धतूरे के नशे से भी अधिक विनाशकारी बताया गया है।

  • व्याख्या: कवि कहते हैं कि ‘कनक’ (सोने/धन) में दूसरे ‘कनक’ (धतूरे) की तुलना में सौ गुना अधिक नशा (मादकता) होता है। धतूरे को तो खाने या निगलने के बाद मनुष्य पागल और उन्मत्त होता है; किंतु सोने (धन-संपत्ति) को तो मात्र पाने या देखने भर से ही मनुष्य अहंकार और घमंड में अंधा होकर पागल (बौरा) हो जाता है। अतः धन का नशा सबसे अधिक घातक है।

  • विशेष:

  1. ‘कनक-कनक’ शब्द की पुनरावृत्ति से अत्यंत प्रसिद्ध यमक अलंकार (पहला कनक = सोना, दूसरा कनक = धतूरा)।

  2. नीति और मनोविज्ञान का अनूठा समन्वय।

(घ) “ओछे बड़े न वै सकें, लगौ सतर है गैन। दीरघ होंहि न नैंक हूँ, फारि निहारै नैन ॥”

  • प्रसंग: प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आलोक (भाग-2)’ के अंतर्गत कवि बिहारीलाल द्वारा रचित ‘दोहा-दशक’ से उद्धृत है। इसमें नीच और ओछे स्वभाव वाले व्यक्ति की स्वाभाविक सीमाओं का यथार्थ चित्रण किया गया है।

  • व्याख्या: कवि बिहारी कहते हैं कि ओछे और क्षुद्र स्वभाव वाले व्यक्ति चाहे कितना भी उछल-कूद लें या आकाश (गगन) को छूने का प्रयास कर लें, वे कभी वास्तव में बड़े और महान नहीं बन सकते। उनका यह प्रयास वैसा ही निष्फल है, जैसे आँखों को चाहे कितना भी फाड़कर और फैलाकर देखा जाए, वे अपने स्वाभाविक आकार से तनिक भी बड़ी (दीर्घ) नहीं हो सकतीं।

  • विशेष:

  1. दृष्टांत अलंकार का अत्यंत सटीक और स्वाभाविक प्रयोग।

  2. मानव-स्वभाव की यथार्थ अभिव्यक्ति।

5. भाषा एवं व्याकरण ज्ञान

1. संधि-विच्छेद :

  • देहावसान = देह + अवसान (दीर्घ स्वर संधि)

  • लोकोक्ति = लोक + उक्ति (गुण स्वर संधि)

  • उज्ज्वल = उत् + ज्वल (व्यंजन संधि)

  • सज्जन = सत् + जन (व्यंजन संधि)

  • दुर्जन = दुस् + जन / दुर् + जन (व्यंजन / विसर्ग संधि)

2. विलोम शब्द :

  • अनुराग — विराग

  • पाप — पुण्य

  • गुण — दोष / अवगुण

  • प्रेम — घृणा

  • सज्जन — दुर्जन

  • मित्र — शत्रु

  • गगन — धरा / पाताल

  • श्रेष्ठ — अधम / निकृष्ट

3. खड़ीबोली (मानक हिन्दी) गद्य रूप :

  1. दोहा: “मीत न नीत गलीत वै, जो धरियै धन जोरि। खाएँ खरचैं जो जुरै, तौ जोरिए करोरि॥”

  • गद्य रूप: मित्रों और परिजनों की दुर्दशा करके धन संचय करना कोई नीति नहीं है। खाने और खर्च करने के बाद यदि धन बचता है, तो करोड़ों रुपये भी अवश्य जोड़ने चाहिए।

  1. दोहा: “न ए बिससिये लखि नये, दुर्जन दुसह सुभाय। आँटे पर प्रानन हरै, काँटे लौं लगि पाय॥”

  • गद्य रूप: दुर्जनों के स्वभाव को अत्यधिक नम्र होते देखकर उन पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे काँटे के समान पाँव में पड़कर (झुककर) अवसर मिलने पर प्राण हर लेते हैं।

4. समस्त पदों का विग्रह एवं समास का नाम :

  1. सतसई = सात सौ (दोहों) का समाहार — द्विगु समास

  2. गोपीनाथ = गोपियों के नाथ (श्रीकृष्ण) — तत्पुरुष समास (या बहुव्रीहि समास)

  3. गुन-औगुन = गुण और अवगुण — द्वंद्व समास

  4. काव्य-रसिक = काव्य का रसिक — तत्पुरुष समास (संबंध तत्पुरुष)

  5. आजीवन = जीवन-भर / जीवन-पर्यंत — अव्ययीभाव समास

5. शब्द-युग्मों के भिन्न अर्थ :

  • कनक — कनक: कनक (सोना/स्वर्ण) — कनक (धतूरा / पलाश / गेहूँ)

  • हार — हार: हार (पराजय/मात) — हार (गले की माला / आभूषण)

  • स्नेह — स्नेह: स्नेह (प्रेम/प्यार) — स्नेह (तेल/चिकनाई)

  • हल — हल: हल (खेत जोतने का यंत्र) — हल (समाधान / उपाय)

  • कल — कल: कल (आने वाला या बीता हुआ दिन / शांति) — कल (मशीन / पुर्जा)

6. परीक्षापयोगी महत्वपूर्ण अतिरिक्त प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1: बिहारी किस राजा के आश्रित कवि थे और उन्हें क्या पुरस्कार मिलता था ?

  • उत्तर: बिहारी जयपुर के महाराज जयसिंह के आश्रित कवि थे और उन्हें प्रत्येक दोहे की रचना पर एक अशर्फी (स्वर्ण मुद्रा) पुरस्कार स्वरूप मिलती थी।

प्रश्न 2: ‘बिहारी सतसई’ में कुल कितने दोहे संकलित हैं ?

  • उत्तर: ‘बिहारी सतसई’ में लगभग 700 (कुल 713) दोहे संकलित हैं।

प्रश्न 3: यूरोपीय विद्वान डॉ. ग्रियर्सन ने ‘बिहारी सतसई’ की प्रशंसा में क्या कहा है ?

  • उत्तर: डॉ. ग्रियर्सन ने कहा है कि पूरे यूरोप में ‘बिहारी सतसई’ के समकक्ष कोई दूसरी रचना उपलब्ध नहीं है।

प्रश्न 4: ‘दोहा-दशक’ के प्रथम पाँच दोहे और अंतिम पाँच दोहे किस विषय से संबंधित हैं ?

  • उत्तर: प्रथम पाँच दोहे भक्तिपरक (श्रीकृष्ण-भक्ति) तथा अंतिम पाँच दोहे नीतिपरक (लोक-व्यवहार एवं नीति) हैं।

Scroll to Top