বোপদেৱ নামৰ এজন ল’ৰা পঢ়া-শুনাত অতি দুৰ্বল আছিল। গুৰুদেৱে হতাশ হৈ তাক ঘৰলৈ উভতি যাবলৈ ক’লে। বাটত পিয়াহ লাগি এটা নাদৰ (কুঁৱা) পাৰত পানী খাবলৈ গৈ সি দেখিলে যে বাৰে বাৰে মাটিৰ কলহ থোৱাৰ ফলত নাদৰ টান শিলৰ পাৰতো গাঁত হৈ গৈছে। তেতিয়া বোপদেৱৰ মনত প্ৰশ্ন আহিল— যদি কোমল মাটিৰ কলহৰ ঘঁহনি খাই কঠিন শিল ক্ষয় হ’ব পাৰে, তেন্তে বাৰে বাৰে চেষ্টা আৰু অনুশীলন (অভ্যাস) কৰিলে সি কিয় পঢ়া-শুনা আয়ত্ত কৰিব নোৱাৰিব! এই আত্মবিশ্বাস লৈ সি পুনৰ আশ্ৰমলৈ উভতি আহিল আৰু নিষ্ঠাৰে পঢ়ি ডাঙৰ হৈ সংস্কৃতৰ এজন প্ৰসিদ্ধ পণ্ডিত হৈ উঠিল।
মূল মন্ত্ৰ: "অভ্যাস আৰু পৰিশ্ৰমেৰে অসাধ্যকো সাধন কৰিব পাৰি।"
| शब्द | अर्थ (Hindi) | অসমীয়া অৰ্থ |
|---|---|---|
| मंदबुद्धि | कम बुद्धि वाला / मूर्ख | কম বুদ্ধিৰ / ভোটা |
| जगत | कुएँ के मुहाने का चबूतरा | নাদৰ ওপৰৰ শিলৰ ভেটি |
| सहपाठी | साथ में पढ़ने वाला | সহপাঠী / লগৰীয়া |
| गड्ढा | जमीन में गहरा स्थान | গাঁত / দ ঠাই |
| निश्चय | दृढ़ संकल्प / निर्णय | দৃঢ় সংকল্প / সিদ্ধান্ত |
| प्रसिद्ध | विख्यात / मशहूर | বিখ্যাত / জনাজাত |
| परिश्रम | मेहनत | পৰিশ্ৰম / কষ্ট |
(क) बोपदेव कैसा बालक था ?
उत्तर: बोपदेव एक मंदबुद्धि और पढ़ने-लिखने में बहुत कमजोर बालक था।
(ख) बोपदेव के सहपाठी उसे क्या कहकर चिढ़ाते थे ?
उत्तर: बोपदेव के सहपाठी उसे 'बुद्धू' और 'मूर्ख' कहकर चिढ़ाते थे।
(ग) गुरुजी ने बोपदेव को कहाँ भेजने का निश्चय किया ?
उत्तर: निराश होकर गुरुजी ने बोपदेव को उसके गाँव भेजने का निश्चय किया।
(क) औरतें कुएँ पर क्या कर रही थीं ?
उत्तर: औरतें कुएँ से पानी भर रही थीं।
(ख) कुएँ की जगत पर गड्ढे कैसे बने थे ?
उत्तर: बार-बार मिट्टी के घड़े रखने की रगड़ से कुएँ की पत्थर वाली जगत पर अपने-आप गड्ढे बन गए थे।
(ग) बोपदेव पाठशाला क्यों लौट आया ?
उत्तर: पत्थर पर घड़े के निशान देखकर बोपदेव को समझ आ गया कि निरंतर अभ्यास करने से विद्या अवश्य आ सकती है। इसलिए उसने मन लगाकर पढ़ने का दृढ़ निश्चय किया और पाठशाला लौट आया।
(ঘ) बोपदेव बड़ा होकर क्या बना ?
उत्तर: बोपदेव बड़ा होकर संस्कृत का एक प्रसिद्ध और महान विद्वान बना।
(क) 'ये गड्ढे किसने बनाए हैं ?'
➔ किसने कहा: बोपदेव ने | किससे कहा: पानी भरने वाली औरत से।
(ख) 'ये गड्ढे हमने नहीं बनाए हैं।'
➔ किसने कहा: एक औरत ने | किससे कहा: बोपदेव से।
"करत करत अभ्यास ते, जड़मति होत सुजान।
रसरि आवत जात ते, सिल पर पड़त निसान।।"
सरल अर्थ:
जिस प्रकार कुएँ की कठोर शिला (पत्थर) पर कोमल रस्सी के बार-बार आने-जाने (घिसने) से भी गहरा निशान पड़ जाता है, ठीक उसी प्रकार लगातार अभ्यास और परिश्रम करने से मंदबुद्धि (मूर्ख) व्यक्ति भी ज्ञानी और बुद्धिमान बन जाता है।
| तद्भव रूप | शुद्ध (मानक) रूप | तद्भव रूप | शुद्ध (मानक) रूप |
|---|---|---|---|
| अरजन | अर्जन | धरम | धर्म |
| मूरख | मूर्ख | करम | कर्म |
| मरम | मर्म | शरम | शर्म |
• बालक : बच्चा, लड़का
• औरत : महिला, स्त्री
• गुरु : शिक्षक, अध्यापक
• घड़ा : मटका, कलश
• पानी : जल, नीर
• प्रसिद्ध : विख्यात, मशहूर
• मैं छात्र हूँ। | मैं छात्रा हूँ।
• तू लिखता है।
• तुम लिखते हो। | तुम कलाकार हो। | तुम महान हो।
• हम विद्यार्थी हैं। | हम साथ-साथ पढ़ते हैं।
• आप शिक्षक हैं।
• मदन और करीम दोस्त हैं।
"परिश्रम और अभ्यास के बिना जीवन में कोई भी सफल नहीं हो सकता।"