मृत्तिका

1. कवि-परिचय 

नरेश मेहता (1922–2000) आधुनिक हिंदी साहित्य के महत्त्वपूर्ण कवि और रचनाकार थे। उनका जन्म मध्य प्रदेश के शाजापुर में हुआ। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एम.ए. किया और आकाशवाणी में भी कार्य किया। वे “दूसरा सप्तक” के प्रमुख कवियों में गिने जाते हैं। उनकी रचनाओं में मानव-जीवन, अस्तित्व, आधुनिक संकट, भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों की अभिव्यक्ति मिलती है। साहित्य-सेवा के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

2. कविता का केंद्रीय भाव

“मृत्तिका” कविता में मिट्टी स्वयं मनुष्य से बात करती है। वह बताती है कि मनुष्य के परिश्रम और सृजन से साधारण मिट्टी अनेक उपयोगी तथा पूजनीय रूपों में बदल जाती है। खेत में वही अन्न देने वाली माता बनती है, कुम्हार के हाथों घड़ा बनकर जीवनदायिनी प्रिया बनती है, खिलौना बनकर बच्चों की खुशी बनती है और प्रतिमा बनकर आराध्य शक्ति का रूप लेती है। कविता का संदेश है कि मनुष्य का पुरुषार्थ ही सबसे बड़ा देवत्व है।

3. पद्यांशों का सरल भावार्थ

मिट्टी का मातृरूप

जब किसान मिट्टी को पैरों से दबाता और हल से चीरता है, तब वही मिट्टी खेत में फसल उगाकर अन्न देती है। इस प्रकार वह सबका पालन करने वाली माँ का रूप धारण कर लेती है।

मिट्टी का प्रियारूप

जब कुम्हार मिट्टी को हाथों से छूकर चाक पर घुमाता है, तब वह घड़ा और कलश बनती है। इन पात्रों में जल भरकर लाया जाता है। इसलिए मिट्टी जीवन में शीतलता और मधुरता लाने वाली निकट प्रिया के समान बन जाती है।

मिट्टी का प्रजारूप

मेले में मिट्टी के रंग-बिरंगे खिलौने बच्चों को आकर्षित करते हैं। जब बच्चे उन्हें पाने के लिए मचलते हैं, तब मिट्टी उनके छोटे हाथों में पहुँचकर संतान या प्रजा के समान हो जाती है।

मिट्टी का चिन्मयी शक्तिरूप

जब मनुष्य अहंकार छोड़कर अपने परिश्रम से मिट्टी को मूर्ति का आकार देता है, तब वह ग्रामदेवता के साथ चेतन और पूजनीय शक्ति बन जाती है। मनुष्य उसी प्रतिमा की आराधना करता है।

कविता का अंतिम संदेश

कवि का विश्वास है कि परिश्रमशील मनुष्य का पुरुषार्थ सबसे बड़ा देवत्व है। मिट्टी में अपने-आप कोई निश्चित रूप नहीं होता; मनुष्य का श्रम और कौशल ही उसे सुंदर, उपयोगी और पूजनीय स्वरूप देता है।

4. महत्त्वपूर्ण लघु प्रश्नोत्तर

प्रश्न: “मृत्तिका” शब्द का अर्थ क्या है?

उत्तर: “मृत्तिका” का अर्थ मिट्टी है।

प्रश्न: मिट्टी कब मातृरूपा बन जाती है?

उत्तर: जब किसान हल चलाकर उसमें अन्न और फसल उगाता है, तब मिट्टी सबका पालन करने वाली माँ के समान मातृरूपा बन जाती है।

प्रश्न: मिट्टी को “अंतरंग प्रिया” क्यों कहा गया है?

उत्तर: मिट्टी से बने घड़े और कलश जल लाकर जीवन में शीतलता और सरसता देते हैं। इसलिए उसे निकट और प्रिय साथी के रूप में देखा गया है।

प्रश्न: मिट्टी प्रजारूपा कब होती है?

उत्तर: जब मिट्टी खिलौनों का रूप लेकर बच्चों के हाथों में पहुँचती है, तब वह प्रजारूपा हो जाती है।

प्रश्न: मिट्टी चिन्मयी शक्ति कैसे बनती है?

उत्तर: मनुष्य अपने श्रम और कला से मिट्टी को देव-प्रतिमा का रूप देता है। तब वही मिट्टी चेतन और पूजनीय शक्ति बन जाती है।

प्रश्न: कविता में सबसे बड़ा देवत्व किसे कहा गया है?

उत्तर: कविता में परिश्रम करने वाले मनुष्य के पुरुषार्थ को सबसे बड़ा देवत्व कहा गया है।

प्रश्न: कविता का मुख्य संदेश क्या है?

उत्तर: कविता सिखाती है कि साधारण वस्तु को महत्त्वपूर्ण रूप मनुष्य का श्रम, कौशल और पुरुषार्थ देता है।

हिंदी पाठ-सहायिका | पाठ 12

5. भाषा एवं व्याकरण-ज्ञान

उचित विराम-चिह्न लगाइए

प्रश्न: (1) महाभारत एक महान ग्रंथ है

उत्तर: महाभारत एक महान ग्रंथ है।
कारण: वाक्य पूरा होने के कारण अंत में पूर्णविराम लगाया गया है।

प्रश्न: (2) युधिष्ठिर भीम अर्जुन नकुल और सहदेव पाँच भाई थे

उत्तर: युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव पाँच भाई थे।
कारण: एक ही श्रेणी के नामों को अलग करने के लिए अल्पविराम लगाए गए हैं।

प्रश्न: (3) भारत में कुल कितने प्रदेश हैं

उत्तर: भारत में कुल कितने प्रदेश हैं?
कारण: यह प्रश्नवाचक वाक्य है, इसलिए अंत में प्रश्नसूचक चिह्न लगाया गया है।

प्रश्न: (4) रामधारी सिंह दिनकर राष्ट्रकवि थे

उत्तर: रामधारी सिंह “दिनकर” राष्ट्रकवि थे।
कारण: उपनाम “दिनकर” के लिए उद्धरण-चिह्न तथा वाक्य के अंत में पूर्णविराम लगाया गया है।

प्रश्न: (5) कर्ण ने कहा मित्रता सुखद छाया है

उत्तर: कर्ण ने कहा, “मित्रता सुखद छाया है।”
कारण: किसी के कथन को ज्यों-का-त्यों दिखाने के लिए उद्धरण-चिह्न लगाए गए हैं।

6. योग्यता-विस्तार

प्रश्न: मिट्टी और मनुष्य के अटूट संबंध के विषय में एक छोटा-सा लेख लिखिए।

उत्तर: मिट्टी और मनुष्य का संबंध जन्म से मृत्यु तक बना रहता है। मनुष्य मिट्टी पर घर बनाता है, मिट्टी में अन्न उगाता है और मिट्टी से बर्तन, खिलौने तथा प्रतिमाएँ बनाता है। पेड़-पौधे भी मिट्टी से ही पोषण प्राप्त करते हैं। हमारे शरीर के लिए आवश्यक भोजन का मूल स्रोत मिट्टी ही है। मनुष्य अपने श्रम से मिट्टी को उपयोगी रूप देता है और मिट्टी मनुष्य को जीवन के साधन देती है। अंत में मनुष्य का शरीर भी मिट्टी में मिल जाता है। इसलिए मिट्टी हमारी जननी, पालनकर्ता और जीवन का आधार है। हमें मिट्टी को प्रदूषण, कटाव और अत्यधिक रसायनों से बचाना चाहिए।

प्रश्न: “देवत्व कोई अलौकिक वस्तु नहीं, बल्कि वह मनुष्य का पुरुषार्थ ही है।” इस विषय पर अपना विचार प्रकट कीजिए।

उत्तर: मेरे विचार से सच्चा देवत्व मनुष्य के अच्छे कर्म, परिश्रम, साहस और सेवा-भाव में है। केवल इच्छा करने से कोई महान नहीं बनता। किसान के परिश्रम से मिट्टी अन्न देती है, कुम्हार के कौशल से वही मिट्टी घड़ा बनती है और मूर्तिकार के पुरुषार्थ से प्रतिमा बनकर पूजी जाती है। इसी प्रकार मनुष्य भी मेहनत, अनुशासन और सदाचार से असंभव कार्यों को संभव बना सकता है। जो व्यक्ति दूसरों की भलाई करता है और कठिनाइयों में भी कर्म करता रहता है, वही वास्तव में देवतुल्य है। इसलिए पुरुषार्थ ही मनुष्य का सबसे बड़ा देवत्व है।

प्रश्न: शिवमंगल सिंह “सुमन” की “मिट्टी की महिमा” कविता और “मृत्तिका” कविता की तुलना कीजिए।

उत्तर: दोनों कविताओं का केंद्र मिट्टी है और दोनों में मिट्टी की महिमा बताई गई है। “मृत्तिका” में नरेश मेहता मिट्टी के बदलते रूपों—माता, प्रिया, प्रजा और चिन्मयी शक्ति—के माध्यम से मनुष्य के पुरुषार्थ को महत्त्व देते हैं। दूसरी ओर “मिट्टी की महिमा” में शिवमंगल सिंह “सुमन” मिट्टी की सहनशीलता, निरंतरता और अमर विश्वास का गुणगान करते हैं। वहाँ मिट्टी बार-बार टूटती, गलती और बिखरती है, फिर भी नए रूप में सँवरती रहती है। दोनों का साझा संदेश है कि मिट्टी जीवन, सृजन और धैर्य का प्रतीक है। अंतर यह है कि पहली कविता का विशेष बल मानव-परिश्रम पर है, जबकि दूसरी कविता का विशेष बल मिट्टी की अविनश्वरता और सहनशक्ति पर है।

7. शब्दार्थ

शब्द

सरल अर्थ

मात्र

केवल

कुंभ-कलश

घड़ा, कलसा

मृत्तिका

मिट्टी

विदीर्ण करना

चीरना, फाड़ना

अंतरंग

घनिष्ठ, निकटतम

मातृरूपा

माँ जैसी

प्रजारूपा

संतान जैसी

स्वत्व

अधिकार या अपना अस्तित्व

ग्राम्यदेव

ग्रामवासियों का लोकदेवता

चिन्मयी शक्ति

चेतना से युक्त ईश्वरीय शक्ति

आराध्य

पूजा के योग्य

पुरुषार्थ

उद्योग, परिश्रम और प्रयत्न

पुरुषार्थ-पराजित स्वत्व

परिश्रम के सामने अहंकार का त्याग किया हुआ अस्तित्व

8. परीक्षा के लिए त्वरित पुनरावृत्ति

मिट्टी का मूल रूप साधारण है, पर मनुष्य का श्रम उसे उपयोगी बनाता है।

खेत में मिट्टी मातृरूपा, घड़े में प्रियारूपा, खिलौने में प्रजारूपा और प्रतिमा में चिन्मयी शक्ति बनती है।

कविता का केंद्रीय विचार मनुष्य के पुरुषार्थ की महत्ता है।

कवि ने मिट्टी को मानवीय रूप देकर अपनी बात कही है; इसे मानवीकरण कहा जाता है।

संदेश: श्रम, सृजन और अहंकार-त्याग से साधारण वस्तु भी महान बन सकती है।

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