नींव की ईंट
■ पाठ का सार एवं संदेश (Summary & Core Message)
पाठ का स्वरूप: यह एक अत्यंत प्रेरक और विचारोत्तेजक ललित/वैचारिक निबंध है।
मूल विषय: निबंध में ‘नींव की ईंट’ और ‘कंगूरे की ईंट’ के प्रतीकों के माध्यम से समाज और राष्ट्र के निर्माण में मूक एवं निःस्वार्थ बलिदानियों के महत्त्व को रेखांकित किया गया है।
प्रतीकार्थ:
नींव की ईंट: वे अनाम, त्यागी और निःस्वार्थ कर्मयोगी जो बिना किसी यश और प्रशंसा की चाह के समाज के आधार को मजबूत करते हैं।
कंगूरे की ईंट: वे लोग जो केवल मान-सम्मान, पद, प्रसिद्धि और दिखावे के लिए शिखर पर बैठते हैं।
युवाओं को आह्वान: आजादी के बाद स्वतंत्र भारत के सात लाख गाँवों और नगरों के नवनिर्माण के लिए आज के युवाओं को कंगूरा बनने की अंधी होड़ छोड़कर ‘नींव की ईंट’ बनने का संकल्प लेना चाहिए।
अभ्यासमाला : सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर
१. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो :
(क) रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म कहाँ हुआ था ?
उत्तर: रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के बेनीपुर गाँव में हुआ था।
(ख) बेनीपुरी जी को जेल की यात्राएँ क्यों करनी पड़ी थी ?
उत्तर: देश के स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लेने के कारण बेनीपुरी जी को कई बार जेल की यात्राएँ करनी पड़ी थीं।
(ग) बेनीपुरी जी का स्वर्गवास कब हुआ था ?
उत्तर: बेनीपुरी जी का स्वर्गवास सन् १९६८ में हुआ था।
(घ) चमकीली, सुंदर, सुघड़ इमारत वस्तुतः किस पर टिकी होती है?
उत्तर: चमकीली, सुंदर, सुघड़ इमारत वस्तुतः जमीन के सात हाथ नीचे गड़ी हुई मजबूत ‘नींव की ईंट’ पर टिकी होती है।
(ङ) दुनिया का ध्यान सामान्यतः किस पर जाता है?
उत्तर: दुनिया का ध्यान सामान्यतः ऊपर की चमक-दमक, बाहरी आवरण और इमारत के सुंदर कंगूरे पर जाता है।
(च) नींव की ईंट को हिला देने का परिणाम क्या होगा ?
उत्तर: नींव की ईंट को हिला देने से ऊपर बना हुआ पूरा कंगूरा और पूरी इमारत बेतहाशा जमीन पर गिरकर नष्ट हो जाएगी।
(छ) सुंदर सृष्टि हमेशा ही क्या खोजती है ?
उत्तर: सुंदर सृष्टि हमेशा ही मूक और निःस्वार्थ ‘बलिदान’ खोजती है।
(ज) लेखक के अनुसार गिरजाघरों के कलश वस्तुतः किनकी शहादत से चमकते हैं ?
उत्तर: लेखक के अनुसार गिरजाघरों के कलश वस्तुतः उन अनाम प्रचारकों और भक्तों की मूक शहादत से चमकते हैं, जिन्होंने धर्म के लिए अपना सर्वस्व चुपचाप न्योछावर कर दिया।
(झ) आज किसके लिए चारों ओर होड़ा-होड़ी मची है?
उत्तर: आज चारों ओर नाम, यश, पद और प्रसिद्धि पाने के लिए ‘कंगूरा’ बनने की होड़ा-होड़ी मची है।
(ञ) पठित निबंध में ‘सुंदर इमारत’ का आशय क्या है?
उत्तर: पठित निबंध में ‘सुंदर इमारत’ का आशय एक आदर्श, उन्नत, सुदृढ़ और समृद्ध नए समाज तथा स्वतंत्र राष्ट्र से है।
२. अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग २५ शब्दों में) :
(क) मनुष्य सत्य से क्यों भागता है?
उत्तर: सत्य प्रायः कठोर और भद्दा (अनाकर्षक) होता है। मनुष्य स्वभावतः कठोरता से कतराता है और केवल बाहरी सुंदरता तथा चमक-दमक की ओर आकर्षित होता है, इसलिए वह सत्य से भागता है।
(ख) लेखक के अनुसार कौन-सी ईंट अधिक धन्य है?
उत्तर: लेखक के अनुसार वह ईंट अधिक धन्य है, जो जमीन के सात हाथ नीचे गड़कर इमारत की नींव बनी, क्योंकि उसी के मूक त्याग और मजबूती पर पूरी इमारत का अस्तित्व टिका होता है।
(ग) नींव की ईंट की क्या भूमिका होती है?
उत्तर: नींव की ईंट इमारत को सुदृढ़ता, स्थायित्व और सुरक्षा प्रदान करती है। वह स्वयं अंधकार में विलीन होकर पूरी इमारत को आकाश की ऊँचाइयों तक पहुँचाने का आधार बनती है।
(घ) कंगूरे की ईंट की भूमिका स्पष्ट करो।
उत्तर: कंगूरे की ईंट इमारत के शीर्ष पर लगकर उसकी बाहरी सुंदरता और शोभा बढ़ाती है तथा दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करती है, किंतु उसका अस्तित्व नींव की ईंट पर ही निर्भर होता है।
(ङ) शहादत का लाल सेहरा कौन-से लोग पहनते हैं और क्यों ?
उत्तर: समाज के वे तपस्वी, निःस्वार्थ और कर्मठ लोग शहादत का लाल सेहरा पहनते हैं, जो बिना किसी नाम और यश की चाह के एक सुंदर और समर्थ समाज के निर्माण के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं।
(च) लेखक के अनुसार ईसाई धर्म को किन लोगों ने अमर बनाया और कैसे ?
उत्तर: ईसाई धर्म को उन अनाम भक्तों और प्रचारकों ने अमर बनाया, जिन्होंने धर्म के प्रचार के लिए जीवित जलाए जाने, सूली पर चढ़ने और भयानक भूख-प्यास जैसी असीम यातनाएँ सहकर भी अपना आत्मोत्सर्ग किया।
(छ) आज देश के नौजवानों के समक्ष चुनौती क्या है?
उत्तर: आज देश के नौजवानों के समक्ष यह चुनौती है कि वे यश और दलगत राजनीति की चाह छोड़कर स्वतंत्र भारत के लाखों गाँवों और नगरों के नवनिर्माण के लिए ‘नींव की ईंट’ बनकर निःस्वार्थ भाव से कार्य करें।
३. संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग ५० शब्दों में) :
(क) मनुष्य सुंदर इमारत के कंगूरे को तो देखा करते हैं, पर उसकी नींव की ओर उनका ध्यान क्यों नहीं जाता ?
उत्तर: मनुष्य की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वह केवल बाहरी चमक-दमक, रूप-रंग और आकर्षण की ओर खिंचता है। कंगूरा इमारत के सबसे ऊपरी भाग में रहकर अपनी सुंदरता से सबका ध्यान खींचता है, जबकि नींव की ईंट जमीन के नीचे अंधकार में दबी रहती है। चूँकि दुनिया ऊपरी आवरण को देखती है और उसके नीचे छिपे ठोस सत्य की उपेक्षा करती है, इसलिए नींव की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता।
(ख) लेखक ने कंगूरे के गीत गाने के बजाय नींव के गीत गाने के लिए क्यों आह्वान किया है?
उत्तर: संसार सदा उन लोगों की प्रशंसा करता है जिन्हें नाम, यश और पद (कंगूरा) मिला है। किंतु वास्तव में किसी भी समाज या राष्ट्र की मजबूती उन अज्ञात, निःस्वार्थ कर्मयोगियों (नींव की ईंटों) पर टिकी होती है, जो चुपचाप अपना सर्वस्व होम कर देते हैं। लेखक चाहते हैं कि समाज इन सच्चे बलिदानियों के त्याग का सम्मान करे और उनसे प्रेरणा ले, इसलिए उन्होंने नींव के गीत गाने का आह्वान किया है।
(ग) सामान्यतः लोग कंगूरे की ईंट बनना तो पसंद करते हैं, परंतु नींव की ईंट बनना क्यों नहीं चाहते ?
उत्तर: कंगूरे की ईंट बनने से मान-सम्मान, प्रसिद्धि, प्रशंसा और लोक-आकर्षण प्राप्त होता है। इसके विपरीत, नींव की ईंट बनने के लिए अंधकार में विलीन होना पड़ता है और बिना किसी प्रचार या श्रेय के चुपचाप कष्ट सहना पड़ता है। मनुष्य स्वभाव से यशलोलुप और स्वार्थी होता है, इसलिए वह कंगूरा बनना चाहता है, नींव की ईंट नहीं।
(घ) लेखक ईसाई धर्म को अमर बनाने का श्रेय किन्हें देना चाहता है और क्यों ?
उत्तर: लेखक ईसाई धर्म को अमर बनाने का श्रेय केवल ईसा मसीह को ही नहीं, बल्कि उन लाखों अज्ञात प्रचारकों और अनुयायियों को देना चाहते हैं जिन्होंने धर्म के प्रचार में अपने प्राण न्योछावर कर दिए। वे जंगलों में भटके, जिंदा जलाए गए और सूली पर चढ़ाए गए, किंतु कभी पीछे नहीं हटे। उन्हीं के मूक त्याग के पुण्य-प्रताप से यह धर्म फला-फूला।
(ङ) हमारा देश किनके बलिदानों के कारण आजाद हुआ ?
उत्तर: हमारा देश केवल उन प्रसिद्ध नेताओं के कारण ही आजाद नहीं हुआ जिनके नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं, बल्कि देश के कोने-कोने में रहने वाले उन असंख्य अनाम देशभक्तों और शहीदों के मूक बलिदान से आजाद हुआ, जिन्होंने महर्षि दधीचि की तरह अपनी अस्थियों का दान देकर विदेशी शासन रूपी वृत्रासुर का संहार किया।
(च) दधीचि मुनि ने किसलिए और किस प्रकार अपना बलिदान किया था ?
उत्तर: पौराणिक कथा के अनुसार, जब वृत्रासुर नामक भयंकर असुर ने देवताओं पर अत्याचार कर त्रिलोक को संकट में डाल दिया था, तब उसके संहार के लिए एक अमोघ अस्त्र (वज्र) की आवश्यकता थी। देवताओं और मानवता की रक्षा के लिए महर्षि दधीचि ने सहर्ष अपने जीवित शरीर का त्याग कर अपनी अस्थियाँ दान में दे दी थीं, जिससे इंद्र ने वज्र बनाकर वृत्रासुर का वध किया।
(छ) भारत के नव-निर्माण के बारे में लेखक ने क्या कहा है?
उत्तर: लेखक ने कहा है कि आजादी के बाद देश के सात लाख गाँवों, हजारों नगरों और कारखानों का नवनिर्माण केवल सरकारी आदेशों या शासकों से संभव नहीं है। इसके लिए ऐसे त्यागी, समर्पित और कर्मठ नौजवानों की आवश्यकता है जो दलबंदियों और प्रशंसा की भूख से दूर रहकर देश के विकास के लिए ‘नींव की ईंट’ बनकर चुपचाप काम करें।
(ज) ‘नींव की ईंट’ शीर्षक निबंध का संदेश क्या है?
उत्तर: इस निबंध का मूल संदेश यह है कि समाज, देश और संस्कृति की वास्तविक प्रगति प्रचार और दिखावे से नहीं, बल्कि मूक, निःस्वार्थ और समर्पित त्याग से होती है। लेखक नई पीढ़ी को यह प्रेरणा देते हैं कि वे कंगूरा बनने की अंधी दौड़ छोड़कर देश के नवनिर्माण की मजबूत ‘नींव की ईंट’ बनें।
४. सम्यक् उत्तर दो (लगभग १०० शब्दों में) :
(क) ‘नींव की ईंट’ का प्रतीकार्थ स्पष्ट करो।
उत्तर: ‘नींव की ईंट’ उन अज्ञात, निःस्वार्थ, तपस्वी और मूक बलिदानियों का प्रतीक है, जो बिना किसी यश, पद, प्रतिष्ठा या प्रशंसा की कामना किए समाज, राष्ट्र और धर्म की नींव को मजबूत करने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। जिस प्रकार जमीन के नीचे दबी हुई मजबूत ईंट पर ही गगनचुंबी इमारत टिकी रहती है, उसी प्रकार समाज और राष्ट्र की वास्तविक आधारशिला वे अनाम कर्मयोगी होते हैं जो अंधकार और उपेक्षा को स्वीकार कर दूसरों के जीवन में प्रकाश और सुख लाते हैं।
(ख) ‘कंगूरे की ईंट’ के प्रतीकार्थ पर सम्यक् प्रकाश डालो।
उत्तर: ‘कंगूरे की ईंट’ समाज के उन लोगों का प्रतीक है जो ऊपरी चमक-दमक, मान-प्रतिष्ठा, पद, प्रसिद्धि और दिखावे के भूखे होते हैं। वे शिखर पर बैठकर संसार की वाहवाही और सम्मान लूटते हैं, किंतु उनका स्वयं का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता; वे पूरी तरह से नींव की ईंटों के त्याग पर ही टिके होते हैं। लेखक ने ऐसे लोगों की तुलना इमारत के कंगूरे से की है जो केवल बाहरी शोभा बढ़ाते हैं, पर समाज को मजबूती प्रदान करने में उनका कोई वास्तविक योगदान नहीं होता।
(ग) ‘हां, शहादत और मौन-मूक! समाज की आधारशिला यही होती है’- का आशय बताओ।
उत्तर: इस पंक्ति का आशय यह है कि किसी भी समाज, राष्ट्र या संस्था का वास्तविक निर्माण और उत्थान उन बलिदानों पर निर्भर करता है जो बिना किसी प्रचार, ढोल-नगाड़े या स्वार्थ के चुपचाप किए जाते हैं। जिस शहादत को प्रसिद्धि और वाहवाही मिल जाती है, वह तो कंगूरे के समान ऊपर चमकती है; परंतु वास्तविक शक्ति और आधार वह मौन शहादत होती है जिसे कोई नहीं जानता। इतिहास में दर्ज नामों से कहीं अधिक उन अनाम शहीदों का योगदान होता है जिन्होंने मौन रहकर अपनी आहुति दी।
५. सप्रसंग व्याख्या करो :
(क) “हम कठोरता से भागते हैं, भद्देपन से मुख मोड़ते हैं, इसीलिए सच से भी भागते हैं।”
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आलोक (भाग-२)’ के अंतर्गत प्रसिद्ध निबंधकार रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा रचित वैचारिक निबंध ‘नींव की ईंट’ से ली गई है।
व्याख्या: लेखक कहते हैं कि मनुष्य का स्वभाव है कि वह हमेशा सुंदरता, कोमलता और चमक-दमक की ओर आकर्षित होता है। जीवन का जो यथार्थ और सत्य है, वह प्रायः कठोर, खुरदुरा और अनाकर्षक होता है। चूँकि मनुष्य कठोरता और भद्देपन का सामना करने से डरता है, इसलिए वह जाने-अनजाने वास्तविक सत्य से भी दूर भागने लगता है और केवल सतही दिखावे को ही सब कुछ मान बैठता है।
(ख) “सुंदर सृष्टि ! सुंदर सृष्टि हमेशा ही बलिदान खोजती है, बलिदान ईंट का हो या व्यक्ति का।”
प्रसंग: प्रस्तुत विचारोत्तेजक पंक्ति रामवृक्ष बेनीपुरी जी द्वारा रचित निबंध ‘नींव की ईंट’ से उद्धृत है।
व्याख्या: लेखक का कहना है कि संसार में किसी भी सुंदर, भव्य और महान वस्तु के निर्माण के पीछे किसी न किसी का गहरा त्याग और बलिदान छिपा होता है। यदि एक सुंदर और मजबूत इमारत बनानी है, तो कुछ ईंटों को जमीन के नीचे दबकर अपना अस्तित्व खोना पड़ता है। ठीक उसी प्रकार, एक आदर्श, सभ्य और उन्नत समाज के निर्माण के लिए भी समर्पित व्यक्तियों को अपने स्वार्थ, सुख और मान-सम्मान का मौन बलिदान देना पड़ता है।
(ग) “अफसोस, कंगूरा बनने के लिए चारों ओर होड़ा-होड़ी मची है, नींव की ईंट बनने की कामना लुप्त हो रही है!”
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्ति रामवृक्ष बेनीपुरी विरचित निबंध ‘नींव की ईंट’ से अवतरित है।
व्याख्या: लेखक समकालीन समाज की आत्मप्रचार और पदलोलुपता की प्रवृत्ति पर गहरा क्षोभ प्रकट करते हुए कहते हैं कि आज हर व्यक्ति केवल नेता, प्रसिद्ध व्यक्ति या शिखर पर विराजमान ‘कंगूरा’ बनना चाहता है। हर कोई मान-सम्मान और श्रेय लूटने की होड़ में लगा है। देश और समाज के लिए चुपचाप आधार बनकर निःस्वार्थ सेवा करने वाले ‘नींव की ईंट’ जैसे त्यागी लोगों का सर्वथा अभाव होता जा रहा है, जो राष्ट्र के नवनिर्माण के लिए अत्यंत चिंताजनक है।
भाषा एवं व्याकरण-ज्ञान
१. निम्नलिखित शब्दों में से अरबी-फारसी के शब्दों का चयन करो :
दिए गए शब्द: इमारत, नींव, दुनिया, शिवम्, जमीन, कंगूरा, मुनहसिर, अस्तित्व, शहादत, कलश, आवरण, रोशनी, बलिदान, शासक, आजाद, अफसोस, शोहरत
अरबी-फारसी शब्द: इमारत, दुनिया, जमीन, कंगूरा, मुनहसिर, शहादत, रोशनी, शासक, आजाद, अफसोस, शोهرत।
२. निम्नांकित शब्दों का प्रयोग करके वाक्य बनाओ :
चमकीली: ताजमहल की चमकीली दीवारें चाँदनी रात में अद्भुत लगती हैं।
कठोरता: सत्य की कठोरता को स्वीकार करना हर किसी के बस की बात नहीं।
बेतहाशा: नींव कमजोर होने पर कंगूरा बेतहाशा जमीन पर आ गिरता है।
भयानक: जंगल में रात का दृश्य अत्यंत भयानक था।
गिरजाघर: शहर के प्राचीन गिरजाघर में लोग प्रार्थना करने जाते हैं।
इतिहास: भारत का स्वाधीनता संग्राम त्याग और बलिदान का गौरवशाली इतिहास है।
३. निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध करो :
(क) अशुद्ध: नहीं तो, हम इमारत की गीत नींव की गीत से प्रारंभ करते।
शुद्ध: नहीं तो, हम इमारत के गीत नींव के गीत से प्रारंभ करते।
(ख) अशुद्ध: ईसाई धर्म उन्हीं के पुण्य-प्रताप से फल-फूल रहे हैं।
शुद्ध: ईसाई धर्म उन्हीं के पुण्य-प्रताप से फल-फूल रहा है।
(ग) अशुद्ध: सदियों के बाद नए समाज की सृष्टि की ओर हम पहला कदम बढ़ाए हैं।
शुद्ध: सदियों के बाद नए समाज की सृष्टि की ओर हमने पहला कदम बढ़ाया है।
(घ) अशुद्ध: हमारे शरीर पर कई अंग होते हैं।
शुद्ध: हमारे शरीर में कई अंग होते हैं।
(ङ) अशुद्ध: हम निम्नलिखित रूपनगर के निवासी प्रार्थना करते हैं।
शुद्ध: हम रूपनगर के निम्नलिखित निवासी प्रार्थना करते हैं।
(च) अशुद्ध: सब ताजमहल की सौंदर्यता पर मोहित होते हैं।
शुद्ध: सब ताजमहल के सौंदर्य (या सुंदरता) पर मोहित होते हैं।
(छ) अशुद्ध: गत रविवार को वह मुंबई जाएगा।
शुद्ध: आगामी रविवार को वह मुंबई जाएगा। (अथवा: गत रविवार को वह मुंबई गया था।)
(ज) अशुद्ध: आप कृपया हमारे घर आने की कृपा करें।
शुद्ध: आप कृपया हमारे घर आएँ। (अथवा: हमारे घर आने की कृपा करें।)
(झ) अशुद्ध: हमें अभी बहुत बातें सीखना है।
शुद्ध: हमें अभी बहुत-सी बातें सीखनी हैं।
(ञ) अशुद्ध: मुझे यह निबंध पढ़कर आनंद का आभास हुआ।
शुद्ध: मुझे यह निबंध पढ़कर आनंद की अनुभूति हुई (या आनंद मिला)।
४. निम्नलिखित लोकोक्तियों का भाव-पल्लवन करो :
(क) अधजल गगरी छलकत जाए:
भाव-पल्लवन: जिस प्रकार आधी भरी हुई गगरी ले जाने पर पानी छलककर बाहर गिरता है, उसी प्रकार कम ज्ञान या अधूरा गुण रखने वाला व्यक्ति दिखावा और डींगें बहुत मारता है। इसके विपरीत, पूर्ण ज्ञानी और गंभीर व्यक्ति सदा शांत, विनम्र और संयमित रहते हैं।
(ख) होनहार बिरवान के होत चिकने पात:
भाव-पल्लवन: जिस प्रकार किसी उत्तम और फलदायी पौधे के पत्ते आरंभ से ही चिकने और स्वस्थ दिखाई देते हैं, उसी प्रकार प्रतिभाशाली और महान बनने वाले बालक के विलक्षण गुण उसके बचपन में ही प्रकट होने लगते हैं।
(ग) अब पछताए क्या होत जब चिड़िया चुग गई खेत:
भाव-पल्लवन: समय बीत जाने के बाद पछतावा करने से कोई लाभ नहीं होता। जब कार्य करने का उचित अवसर हाथ से निकल जाता है, तब शोक करने से बिगड़ा काम नहीं सुधरता। अतः समय रहते ही सावधान और सचेत होकर कार्य करना चाहिए।
(घ) जाको राखे साइयाँ मार सके न कोय:
भाव-पल्लवन: जिस मनुष्य पर ईश्वर की कृपा और रक्षा होती है, उसका कोई भी शत्रु बाल भी बाँका नहीं कर सकता। संसार की कोई भी विपत्ति या अनिष्टकारी शक्ति ईश्वरीय संरक्षण प्राप्त व्यक्ति का कुछ नहीं बिगाड़ सकती।
५. निम्नलिखित शब्दों के दो-दो अर्थ बताओ (अनेकार्थी शब्द) :
अंबर: (१) आकाश, (२) वस्त्र
उत्तर: (१) एक दिशा, (२) जवाब / प्रश्न का उत्तर
काल: (१) समय, (२) मृत्यु / यमराज
नव: (१) नया (नवीन), (२) नौ (संख्या ९)
पत्र: (१) पत्ता, (२) चिट्ठी / पत्र
मित्र: (१) सखा / दोस्त, (२) सूर्य
वर्ण: (१) रंग, (२) अक्षर
हार: (१) पराजय, (२) गले की माला
कल: (१) बीता हुआ या आने वाला दिन, (२) मशीन / पुर्जा
कनक: (१) सोना (स्वर्ण), (२) धतूरा (या गेहूँ)
६. निम्नांकित शब्द-जोड़ों के अर्थ का अंतर बताओ :
अगम – दुर्गम:
अगम: जहाँ पहुँचा ही न जा सके।
दुर्गम: जहाँ पहुँचना अत्यंत कठिन हो।
अपराध – पाप:
अपराध: राज्य या देश के प्रचलित कानून का उल्लंघन (कानूनी दोष)।
पाप: धर्म या नैतिक नियमों का उल्लंघन।
अस्त्र – शस्त्र:
अस्त्र: वह हथियार जिसे फेंककर चलाया जाता है (जैसे— तीर, भाला)।
शस्त्र: वह हथियार जिसे हाथ में पकड़कर युद्ध किया जाता है (जैसे— तलवार, गदा)।
आधि – व्याधि:
आधि: मानसिक कष्ट या चिंता।
व्याधि: शारीरिक रोग या बीमारी।
दुख – खेद:
दुख: कष्ट या पीड़ा की अनुभूति।
खेद: किसी गलती या अनचाही घटना पर होने वाला दुख या पछतावा।
स्त्री – पत्नी:
स्त्री: कोई भी महिला या नारी।
पत्नी: विवाहित महिला (सहधर्मिणी)।
आज्ञा – अनुमति:
आज्ञा: बड़ों या अधिकारियों द्वारा दिया गया आदेश।
अनुमति: किसी कार्य को करने के लिए दी गई सहमति।
अहंकार – गर्व:
अहंकार: अपनी शक्ति या ज्ञान का झूठा घमंड (नकारात्मक)।
गर्व: अपनी किसी उपलब्धि या सत्कर्म पर होने वाला स्वाभिमान (सकारात्मक)।