मुरझाया फूल
अभ्यासमाला : प्रश्नोत्तर
(अ) सही विकल्प का चयन करो :
कवयित्री महादेवी वर्मा की तुलना की जाती है —
(क) सुभद्रा कुमारी चौहान के साथ (ख) मीराँबाई के साथ (ग) उषा देवी मित्रा के साथ (घ) मन्नू भंडारी के साथ
उत्तर: (ख) मीराँबाई के साथ
कवयित्री महादेवी वर्मा का जन्म कहाँ हुआ था ?
(क) गाजियाबाद में (ख) हैदराबाद में (ग) फैजाबाद में (घ) फर्रुखाबाद में
उत्तर: (घ) फर्रुखाबाद में
महादेवी वर्मा की माता का नाम क्या था ?
(क) हेमरानी वर्मा (ख) पद्मावती वर्मा (ग) फूलमती वर्मा (घ) कलावती वर्मा
उत्तर: (क) हेमरानी वर्मा
‘हास्य करता था, ______ अंक में तुझको पवन।’
(क) खिलाता (ख) हिलाता (ग) सहलाता (घ) सुलाता
उत्तर: (क) खिलाता
‘यत्न माली का रहा ______ से भरता तुझे।’
(क) प्यार (ख) आनंद (ग) सुख (घ) धीरे
उत्तर: (ख) आनंद
करतार ने धरती पर सबको कैसा बनाया है ?
(क) सुंदर (ख) त्यागमय (ग) स्वार्थमय (घ) निर्दय
उत्तर: (ग) स्वार्थमय
(आ) ‘हाँ’ या ‘नहीं’ में उत्तर do :
छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा रहस्यवादी कवयित्री के रूप में भी प्रसिद्ध हैं।
उत्तर: हाँ
महादेवी वर्मा के पिता-माता उदार विचारवाले नहीं थे।
उत्तर: नहीं (वे अत्यंत उदार विचार वाले थे)
महादेवी वर्मा ने जीवन भर शिक्षा और साहित्य की साधना की।
उत्तर: हाँ
वायु पंखा झल कर फूल को सुख पहुँचाती रहती है।
उत्तर: हाँ
मुरझाए फूल की दशा पर संसार को दुख नहीं होता।
उत्तर: हाँ
(इ) पूर्ण वाक्य में उत्तर दो :
महादेवी वर्मा की कविताओं में किनके प्रति विरहानुभूति की तीव्रता परिलक्षित होती है ?
उत्तर: महादेवी वर्मा की कविताओं में सर्वव्यापी परम सत्ता (अज्ञात प्रियतम / परमात्मा) के प्रति विरहानुभूति की तीव्रता परिलक्षित होती है।
महादेवी वर्मा का विवाह कब हुआ था ?
उत्तर: महादेवी वर्मा का विवाह तब हुआ था जब वे छठी कक्षा में पढ़ती थीं (बाल्यावस्था में)।
महादेवी वर्मा ने किस रूप में अपने कर्म-जीवन का श्रीगणेश किया था ?
उत्तर: महादेवी वर्मा ने ‘प्रयाग महिला विद्यापीठ’ की प्राचार्या के रूप में अपने कर्म-जीवन का श्रीगणेश किया था।
फूल कौन-सा कार्य करते हुए भी हरषाता रहता है ?
उत्तर: फूल अपना सर्वस्व (रूप, रस और सुगंध) संसार को दान करते हुए भी दूसरों को आनंदित देखकर हरषाता (प्रसन्न रहता) है।
भ्रमर फूल पर क्यों मँडराने लगते हैं ?
उत्तर: भ्रमर (भौंरे) खिले हुए फूल के मधुर रस (मकरंद / मधु) के लोभ में उस पर मँडराने लगते हैं।
(ई) अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्दों में) :
किन गुणों के कारण महादेवी वर्मा की काव्य-रचनाएँ हिन्दी-पाठकों को विशेष प्रिय रही हैं ?
उत्तर: अज्ञात प्रियतम के प्रति विरहानुभूति, व्यक्तिगत वेदना को लोक-कल्याणकारी करुणा से जोड़ने की भावना, कोमलता, मधुरता और गेयता के कारण महादेवी वर्मा की रचनाएँ पाठकों को विशेष प्रिय हैं।
महादेवी वर्मा की प्रमुख काव्य-रचनाएँ क्या-क्या हैं? किस काव्य-संकलन पर उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ था ?
उत्तर: उनकी प्रमुख काव्य-रचनाएँ हैं— ‘नीहार’, ‘रश्मि’, ‘नीरजा’, ‘सांध्यगीत’, ‘दीपशिखा’ और ‘यामा’। उन्हें ‘यामा’ काव्य-संकलन पर सर्वोच्च ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ प्राप्त हुआ था।
फूल किस स्थिति में धरा पर पड़ा हुआ है ?
उत्तर: फूल पूरी तरह सूखकर, अपनी सुगंध और कोमलता खोकर, मुरझाए हुए मुख के साथ धूल-धूसरित होकर बेसहारा पृथ्वी (धरा) पर पड़ा हुआ है।
खिले फूल और मुरझाए फूल के साथ पवन के व्यवहार में कौन-सा अंतर देखने को मिलता है ?
उत्तर: जब फूल खिला हुआ था, तब पवन उसे अपनी गोद में खिलाता और पंखा झलता था; किंतु मुरझा जाने पर उसी पवन ने अपने तीव्र झोंके से उसे तोड़कर जमीन पर गिरा दिया।
खिले फूल और मुरझाए फूल के प्रति भौंरे के व्यवहार क्या भिन्न-भिन्न होते हैं ?
उत्तर: खिले फूल के मधुर रस के लालच में भौंरे उस पर प्रेम से मँडराते और गूँजते हैं, किंतु फूल के मुरझाते ही वे उसकी ओर मुड़कर भी नहीं देखते।
(उ) संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 50 शब्दों में) :
महादेवी वर्मा की साहित्यिक देन का उल्लेख करो।
उत्तर: महादेवी वर्मा छायावादी काव्य-धारा की आधारस्तंभ हैं। उन्होंने गद्य और पद्य दोनों विधाओं में कालजयी रचनाएँ दीं। ‘यामा’, ‘नीरजा’, ‘दीपशिखा’ जैसे काव्य-ग्रंथों में रहस्यवाद और करुणा की अनुपम अभिव्यक्ति है। वहीं ‘अतीत के चलचित्र’ और ‘स्मृति की रेखाएँ’ जैसे संस्मरणों व रेखाचित्रों से उन्होंने हिन्दी गद्य-साहित्य को नई ऊँचाई दी।
खिले फूल के प्रति किस प्रकार सब आकर्षित होते हैं, पठित कविता के आधार पर वर्णन करो।
उत्तर: जब फूल कली से खिलकर सुंदर और कोमल बनता है, तो पूरी प्रकृति उसका स्वागत करती है। पवन उसे गोद में खिलाती है, चंद्रमा की स्निग्ध किरणें उसे हँसाती हैं, ओस की बूँदें मोतियों से उसका श्रृंगार करती हैं, माली यत्न से उसे सींचता है और भौंरे उसके मधुर रस के लोभ में चारों ओर मँडराते हैं।
पठित कविता के आधार पर मुरझाए फूल के साथ किए जाने वाले बर्ताव का उल्लेख करो।
उत्तर: मुरझा जाने पर फूल के प्रति संसार का बर्ताव पूरी तरह बदल जाता है। जिस वृक्ष की डाल पर वह खिला था, वह उसके गिरने पर एक बूँद आँसू नहीं बहाता। भौंरे उसके पास नहीं आते और पवन एक झोंके से उसे जमीन पर पटक देती है। कोई भी उसकी दुर्दशा पर दुख प्रकट नहीं करता।
पठित कविता के आधार पर दानी सुमन की भूमिका पर प्रकाश डालो।
उत्तर: ‘दानी सुमन’ (त्यागी फूल) निस्वार्थ परोपकार का प्रतीक है। वह बिना किसी स्वार्थ या प्रतिदान की आशा किए अपना सारा रूप, रंग, मधुर रस और सुगंध संसार को दान कर देता है। संसार की उपेक्षा और निर्ममता सहकर भी वह अंत समय तक दूसरों को आनंदित देखकर स्वयं प्रसन्न (हरषाता) रहता है।
(ऊ) सम्यक् उत्तर दो (लगभग 100 शब्दों में) :
कवयित्री महादेवी वर्मा का साहित्यिक परिचय प्रस्तुत करो।
उत्तर: महादेवी वर्मा आधुनिक हिन्दी साहित्य में छायावाद की प्रमुख चार विभूतियों में से एक हैं। उनका जन्म 1907 ई. में फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ।
उपाधि: विरह और करुणा की सघन अनुभूति के कारण इन्हें ‘आधुनिक मीरा’ कहा जाता है।
काव्य-रचनाएँ: ‘नीहार’, ‘रश्मि’, ‘नीरजा’, ‘सांध्यगीत’, ‘दीपशिखा’ और ‘यामा’।
गद्य-रचनाएँ: ‘स्मृति की रेखाएँ’, ‘अतीत के चलचित्र’, ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ और ‘पथ के साथी’।
पुरस्कार: ‘यामा’ पर भारतीय ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ तथा भारत सरकार द्वारा ‘पद्मश्री’ व ‘पद्म विभूषण’।
भाषा एवं शैली: इनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ, तत्समप्रधान, मधुर, कोमलकांत और संगीतात्मक खड़ीबोली है। 1987 ई. में इनका देहावसान हुआ।
‘मुरझाया फूल’ शीर्षक कविता में फूल के बारे में क्या-क्या कहा गया है ?
उत्तर: ‘मुरझाया फूल’ कविता में फूल की शैशवावस्था (कली) से लेकर उसके अंत तक की जीवन-यात्रा का मार्मिक वर्णन किया गया है। बचपन में कली के रूप में पवन उसे खिलाती थी, चाँदनी हँसाती थी और ओस उसका श्रृंगार करती थी। युवावस्था में खिलकर उसने अपना संपूर्ण रूप, रंग, रस और सुगंध संसार को समर्पित कर दिया। किंतु जीवन के अंतिम पड़ाव में जब वह सूखकर धरा पर गिर पड़ा, तो भौंरों, वृक्ष और पवन सबने उसे भुला दिया। इस प्रकार फूल का जीवन निस्वार्थ त्याग और समर्पण का प्रतीक है, जिसे संसार उपभोग के बाद भुला देता है।
‘मुरझाया फूल’ कविता के माध्यम से कवयित्री ने मानव जीवन के संदर्भ में क्या संदेश दिया है ?
उत्तर: कवयित्री ने फूल के माध्यम से मानव जीवन के शाश्वत सत्य और संसार की स्वार्थपरता का संदेश दिया है। कवयित्री कहती हैं कि जब तक मनुष्य के पास यौवन, धन, शक्ति और सौंदर्य होता है, तब तक संसार उसका आदर करता है और उससे स्वार्थ सिद्ध करता है। किंतु वृद्धावस्था, विपत्ति या शक्तिहीन होने पर यह स्वार्थी संसार उसे त्याग देता है। अतः मनुष्य को संसार के इस झूठे आकर्षण से मोह त्यागकर फूल की तरह निस्वार्थ भाव से समाज-कल्याण और परोपकार में अपना जीवन समर्पित करना चाहिए।
पठित कविता के आधार पर फूल के जीवन और मानव जीवन की तुलना करो।
उत्तर: फूल और मानव जीवन में गहरी समानता है:
शैशव व विकास: फूल की कली की तरह मानव का बचपन भी लाड़-प्यार और दुलार में पलता है।
यौवन व प्रतिष्ठा: खिले फूल की तरह जब मनुष्य युवा, संपन्न और गुणवान होता है, तो मित्र और समाज उसके इर्द-गिर्द मँडराते हैं।
वृद्धावस्था व उपेक्षा: मुरझाए फूल की भांति जब मनुष्य वृद्ध, अशक्त और साधनहीन हो जाता है, तो स्वार्थी दुनिया उससे मुँह मोड़ लेती है।
सार्थकता: फूल की वास्तविक सार्थकता अपना सर्वस्व दान करने में है; इसी प्रकार मानव जीवन की सार्थकता भी निस्वार्थ परोपकार और सेवा में ही निहित है।
(ई) प्रसंग सहित व्याख्या करो (लगभग 100 शब्दों में) :
“स्निग्ध किरणें चंद्र की, तुझको हँसाती थीं सदा। ओस मुक्ता-जाल से, श्रृंगारती थी सर्वदा ॥”
प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आलोक (भाग-2)’ के पद्य खण्ड के अंतर्गत महादेवी वर्मा द्वारा रचित कविता ‘मुरझाया फूल’ से उद्धृत है। इसमें खिले हुए फूल के यौवनकाल पर प्रकृति के अगाध प्रेम का वर्णन है।
व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि जब तू डाल पर खिला हुआ सुंदर फूल था, तब प्रकृति के सभी अंग तेरे सौंदर्य को बढ़ाने में लगे थे। चंद्रमा की शीतल और निर्मल (स्निग्ध) किरणें तुझे रातभर हँसाती और आनंद देती थीं। प्रातःकाल ओस की चमकीली बूँदें मोतियों के जाल (मुक्ता-जाल) के समान तेरे ऊपर सजकर तेरा नित्य नव श्रृंगार करती थीं। उस समय पूरी प्रकृति तेरे सौंदर्य पर मुग्ध थी।
विशेष:
प्रकृति का मानवीकरण और रूपक अलंकार (‘मुक्ता-जाल’)।
कोमलकांत पदावली और छायावादी शैली।
“कर रहा अठखेलियाँ, इतरा सदा उद्यान में। अंत का यह दृश्य आया, था कभी क्या ध्यान में ॥”
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियाँ महादेवी वर्मा रचित ‘मुरझाया फूल’ कविता से ली गई हैं। इसमें सुख के समय जीवन की नश्वरता को भूल जाने की मानवीय प्रवृत्ति पर फूल के माध्यम से संकेत किया गया है।
व्याख्या: कवयित्री मुरझाए फूल से कहती हैं कि जब तू बगीचे (उद्यान) में अपनी डाल पर झूमता हुआ चंचल क्रीड़ाएँ (अठखेलियाँ) करता था और अपने रूप-रंग पर इतराता था; क्या उस सुख और यौवन के मद में कभी तेरे मन में यह विचार आया था कि एक दिन ऐसा भयानक अंत भी आएगा जब तुझे सूखकर इस प्रकार धूल में गिरना पड़ेगा? आशय यह है कि सुख के समय मनुष्य अपने भविष्य और मृत्यु के अटल सत्य को भूल जाता है।
विशेष:
जीवन की क्षणभंगुरता और नश्वरता का मार्मिक बोध।
प्रश्न शैली के माध्यम से आत्म-निरीक्षण की प्रेरणा।
“मत व्यथित हो पुष्प, किसको सुख दिया संसार ने ? स्वार्थमय सबको बनाया, है यहाँ करतार ने ॥”
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियाँ महादेवी वर्मा की कविता ‘मुरझाया फूल’ से उद्धृत हैं। इसमें कवयित्री उपेक्षित और मुरझाए फूल को सांत्वना देते हुए संसार की स्वार्थी प्रवृत्ति को स्पष्ट करती हैं।
व्याख्या: कवयित्री फूल को ढाढ़स बंधाते हुए कहती हैं कि हे पुष्प! तू संसार की इस बेरुखी और उपेक्षा से दुखी मत हो। इस संसार ने आज तक किसको सच्चा और स्थायी सुख दिया है? इस सृष्टि के रचयिता (करतार) ने यहाँ प्रत्येक प्राणी को केवल अपने स्वार्थ में लिप्त बनाया है। जब तक तुझसे स्वार्थ सिद्ध हो रहा था, सब तेरे आगे-पीछे थे; स्वार्थ खत्म होते ही सबने तुझे भुला दिया। यह संसार का स्वाभाविक नियम है।
विशेष:
संसार की स्वार्थपरक वास्तविकता का सटीक चित्रण।
दार्शनिक और वैराग्यपूर्ण दृष्टिकोण।
“जब न तेरी ही दशा पर, दुःख हुआ संसार को ! कौन रोएगा सुमन, हमसे मनुज निस्सार को ?”
प्रसंग: प्रस्तुत भावपूर्ण पंक्तियाँ ‘मुरझाया फूल’ कविता की अंतिम पंक्तियाँ हैं, जिनकी रचयिता महादेवी वर्मा हैं। इसमें फूल के त्याग की तुलना में मनुष्य के नगण्य अस्तित्व को दर्शाया गया है।
व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि हे सुमन! जब तूने अपना सर्वस्व (रूप, रस, गंध) बिना किसी स्वार्थ के संसार को दान कर दिया, फिर भी तेरी इस दयनीय दशा पर इस निष्ठुर संसार को तनिक भी दुख नहीं हुआ; तो फिर हम जैसे स्वार्थी, तुच्छ और सारहीन (निस्सार) मनुष्यों की मृत्यु या दुर्दशा पर यह संसार भला क्यों रोएगा? जब त्यागी का यह हाल है, तो स्वार्थी मनुष्य के लिए किसी की आँखों में आँसू की अपेक्षा करना व्यर्थ है।
विशेष:
कविता का चरम संदेश और आत्म-बोध।
अनुप्रास अलंकार और मार्मिक भाव-व्यंजना।
5. भाषा एवं व्याकरण ज्ञान
1. मुहावरों के अर्थ एवं वाक्य प्रयोग :
श्रीगणेश करना (आरंभ करना / शुरुआत करना):
वाक्य: उन्होंने आज अपने नए कार्य का श्रीगणेश किया।
आँखों का तारा (अत्यधिक प्यारा होना):
वाक्य: बालक कृष्ण माता यशोदा की आँखों के तारे थे।
नौ दो ग्यारह होना (भाग जाना / रफूचक्कर होना):
वाक्य: पुलिस को देखते ही चोर नौ दो ग्यारह हो गए।
हवा से बातें करना (बहुत तेज गति से दौड़ना):
वाक्य: महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक हवा से बातें करता था।
अंधे की लकड़ी (एकमात्र सहारा होना):
वाक्य: श्रवण कुमार अपने वृद्ध माता-पिता के लिए अंधे की लकड़ी थे।
लकीर का फकीर होना (पुरानी रूढ़ियों या परंपराओं पर ही चलते रहना):
वाक्य: हमें लकीर का फकीर होने के बजाय नए वैज्ञानिक विचारों को अपनाना चाहिए।
2. काव्य-पंक्तियों का गद्य-रूप :
(क) पद्य:
खिल गया जब पूर्ण तू, मंजुल सुकोमल फूल बन। लुब्ध मधु के हेतु मँडराने लगे, उड़ते भ्रमर ॥
गद्य रूप: जब तू सुंदर और अत्यंत कोमल फूल बनकर पूरी तरह खिल गया, तब उड़ते हुए भौंरे तेरे मधुर रस के लोभ में तेरे चारों ओर मँडराने लगे।
(ख) पद्य:
जिस पवन ने अंक में, ले प्यार था तुझको किया। तीव्र झोंके से सुला, उसने तुझे भू पर दिया ॥
गद्य रूप: जिस पवन ने तुझे अपनी गोद में लेकर प्यार से खिलाया था, उसी पवन ने अपने तेज झोंके से तुझे तोड़कर जमीन पर सुला दिया।
3. लिंग-निर्धारण :
कली — स्त्रीलिंग
शैशव — पुल्लिंग
फूल — पुल्लिंग
किरण — स्त्रीलिंग
वायु — स्त्रीलिंग
माली — पुल्लिंग
कोमलता — स्त्रीलिंग
सौरभ — पुल्लिंग
दशा — स्त्रीलिंग
4. वचन परिवर्तन :
भौंरा — भौंरे
किरणें — किरण
अठखेलियाँ — अठखेली
झोंके — झोंका
चिड़िया — चिड़ियाँ
रेखाएँ — रेखा
बात — बातें
कली — कलियाँ
5. लिंग परिवर्तन :
कवयित्री — कवि
प्रियतम — प्रियतमा
पिता — माता
पुरुष — स्त्री
प्राचार्या — प्राचार्य
माली — मालिन
देव — देवी
मोरनी — मोर
6. ‘कार’ शब्दांश में उपसर्ग जोड़कर शब्द और वाक्य प्रयोग :
आ + कार = आकार (बनावट / स्वरूप):
वाक्य: पृथ्वी का आकार गोल है।
वि + कार = विकार (दोष / बुराई):
वाक्य: हमें अपने मन के विकारों को दूर करना चाहिए।
प्र + कार = प्रकार (तरह / भेद):
वाक्य: बगीचे में अनेक प्रकार के फूल खिले हैं।
उप + कार = उपकार (भलाई / नेकी):
वाक्य: दूसरों पर उपकार करना ही सच्चा धर्म है।
अप + कार = अपकार (बुराई / अहित):
वाक्य: हमें कभी किसी का अपकार नहीं करना चाहिए।
प्रति + कार = प्रतिकार (बदला / विरोध):
वाक्य: अन्याय का प्रतिकार करना वीरों का काम है।
6. परीक्षापयोगी महत्वपूर्ण अतिरिक्त प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1: महादेवी वर्मा को किस काव्य-ग्रंथ के लिए ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ मिला था ?
उत्तर: महादेवी वर्मा को उनके समग्र काव्य-संकलन ‘यामा’ के लिए भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ था।
प्रश्न 2: महादेवी वर्मा को ‘आधुनिक युग की मीरा’ क्यों कहा जाता है ?
उत्तर: मीराँबाई की तरह महादेवी वर्मा के काव्य में भी अज्ञात परमात्मा के प्रति अनन्य प्रेम, सघन विरह-वेदना और आत्म-समर्पण की तीव्र अनुभूति मिलती है, इसलिए उन्हें आधुनिक युग की मीरा कहा जाता है।
प्रश्न 3: ‘मुरझाया फूल’ कविता में ‘मुक्ता-जाल’ से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर: ‘मुक्ता-जाल’ से तात्पर्य प्रातःकाल फूल की पंखुड़ियों पर सजी हुई मोतियों जैसी चमकती ओस की बूँदों के समूह से है।
प्रश्न 4: ‘मुरझाया फूल’ कविता से विद्यार्थियों को क्या शिक्षा मिलती है ?
उत्तर: इस कविता से यह शिक्षा मिलती है कि संसार की स्वार्थपरता की चिंता किए बिना मनुष्य को फूल की तरह जीवनपर्यंत निस्वार्थ भाव से समाज और दूसरों के कल्याण के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करना चाहिए।