नर ही, न निराशा करी मन की
अभ्यासमाला : प्रश्नोत्तर
(अ) सही विकल्प का चयन करो :
कवि ने हमें प्रेरणा दी है —
(क) कर्म की (ख) आशा की (ग) गौरव की (घ) साधन की
उत्तर: (क) कर्म की
कवि के अनुसार मनुष्य को अमरत्व प्राप्त हो सकता है —
(क) अपने नाम से (ख) धन से (ग) भाग्य से (घ) अपने व्यक्तित्व से
उत्तर: (घ) अपने व्यक्तित्व से (सत्कर्मों और व्यक्तित्व द्वारा)
कवि के अनुसार ‘न निराश करो मन को’ का आशय है —
(क) सफलता प्राप्त करने के लिए आशावान होना।
(ख) मन में निराशा तो हमेशा बनी रहती है।
(ग) मनुष्य अपने प्रयत्न से असफलता को भी सफलता में बदल सकता है।
(घ) आदमी को अपने गौरव का ध्यान हमेशा रहता है।
उत्तर: (ग) मनुष्य अपने प्रयत्न से असफलता को भी सफलता में बदल सकता है।
(आ) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखो (लगभग 50 शब्दों में) :
तन को उपयुक्त बनाए रखने के क्या उपाय हैं ?
उत्तर: तन (शरीर) को उपयुक्त बनाए रखने का सबसे बड़ा उपाय यह है कि मनुष्य आलस्य और अकर्मण्यता को त्यागकर अपने शरीर को निरंतर रचनात्मक, जनकल्याणकारी और सार्थक कर्मों में लगाए रखे। समय का सदुपयोग करते हुए शारीरिक और मानसिक सामर्थ्य को अपने लक्ष्यों की प्राप्ति में लगाना ही तन को उपयुक्त बनाना है।कवि के अनुसार जग को निरा सपना क्यों नहीं समझना चाहिए ?
उत्तर: कवि के अनुसार इस संसार को केवल एक ‘निरा सपना’ (मिथ्या या भ्रम) समझकर हाथ पर हाथ रखकर बैठना अनुचित है, क्योंकि यह संसार कर्मभूमि है। यदि हम इसे केवल सपना मान लेंगे, तो हम निष्क्रिय हो जाएँगे। मनुष्य को वास्तविक धरातल पर उतरकर अपने पुरुषार्थ और परिश्रम से सफलता का मार्ग स्वयं बनाना चाहिए।अमरत्व-विधान से कवि का क्या तात्पर्य है ?
उत्तर: ‘अमरत्व-विधान’ से कवि का तात्पर्य ऐसे महान, परोपकारी, श्रेष्ठ और अमर कर्म करने से है, जिससे मनुष्य इस नश्वर संसार से जाने (मृत्यु) के बाद भी अपनी कीर्ति, सुयश और आदर्शों के रूप में सदैव जीवित रहे। शरीर भले ही नष्ट हो जाए, किंतु सुकर्मों के कारण मनुष्य अमर हो जाता है।अपने गौरव का किस प्रकार ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर: मनुष्य को सदैव इस बात का आत्म-विश्वास और भान होना चाहिए कि “हम भी कुछ हैं” अर्थात् हम ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना हैं। हमें किसी भी परिस्थिति में अपने स्वाभिमान, मान-मर्यादा और आत्म-गौरव से समझौता नहीं करना चाहिए। भले ही सब कुछ चला जाए, किंतु अपने सम्मान और सत्य के साधन-मार्ग को कभी नहीं छोड़ना चाहिए।कविता का प्रतिपाद्य अपने शब्दों में लिखो।
उत्तर: ‘नर हो, न निराश करो मन को’ कविता का मुख्य प्रतिपाद्य (संदेश) कर्मठता, आशावादिता, स्वावलंबन और आत्म-सम्मान है। कवि मनुष्य को प्रेरित करते हैं कि वह मानव है, इसलिए उसे किसी भी विफलता या संकट में निराश नहीं होना चाहिए। ईश्वर का सहारा लेकर, उपलब्ध साधनों और सुअवसरों का सदुपयोग करते हुए निरंतर कर्म करना चाहिए ताकि यह अमूल्य मानव जीवन व्यर्थ न जाए।
(इ) सप्रसंग व्याख्या करो (लगभग 100 शब्दों में) :
“सँभलो कि सु-योग न जाए चला, कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला ? समझो जग को न निरा सपना, पथ आप प्रशस्त करो अपना। अखिलेश्वर है अवलंबन को, नर हो, न निराश करो मन को ॥”
प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आलोक (भाग-2)’ के पद्य खण्ड के अंतर्गत राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित प्रेरणादायी कविता ‘नर हो, न निराश करो मन को’ से उद्धृत है। इसमें कवि ने समय के सदुपयोग, स्वावलंबन और ईश्वरीय संबल का महत्व समझाया है।
व्याख्या: कवि मनुष्य को सचेत करते हुए कहते हैं कि सावधान हो जाओ, ताकि तुम्हारे हाथ से यह सुनहरा अवसर (सुयोग) निकल न जाए। जीवन में किया गया अच्छा और नेक उपाय (सदुपाय) कभी निष्फल नहीं होता। इस संसार को केवल एक झूठा सपना समझकर कर्महीन मत बनो, बल्कि अपने परिश्रम से अपनी उन्नति का मार्ग स्वयं बनाओ। तुम्हारे सहारे के लिए स्वयं सर्वशक्तिमान ईश्वर (अखिलेश्वर) उपस्थित हैं। तुम मनुष्य हो, इसलिए कभी मन को निराश मत करो।
विशेष:
कर्मण्यता और समय के सदुपयोग का ओजस्वी संदेश।
शुद्ध एवं प्रांजल खड़ीबोली हिन्दी तथा तुकांत युक्त गेय शैली।
“जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ, फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ ? तुम स्वत्त्व-सुधा-रस पान करो, उठके अमरत्व-विधान करो। दव-रूप रहो भव-कानन को, नर हो, न निराश करो मन को ॥”
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियाँ राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की प्रसिद्ध कविता ‘नर हो, न निराश करो मन को’ से ली गई हैं। इसमें कवि ने मनुष्य को अपने आत्म-अधिकार और असीम सामर्थ्य को पहचानने की प्रेरणा दी है।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि जब ईश्वर ने संसार के सभी आवश्यक साधन, तत्त्व और क्षमताएँ तुम्हें प्रदान की हैं, तो तुम्हारी आंतरिक शक्ति (सत्त्व) और सफलता कहीं बाहर नहीं जा सकती। तुम्हें अपने आत्म-अधिकार (स्वत्त्व) रूपी अमृत का रसपान करना चाहिए और आलस्य त्यागकर ऐसे श्रेष्ठ कर्म करने चाहिए जिससे तुम्हें अमरता प्राप्त हो। जिस प्रकार दावानल (दव) जंगल को भस्म कर देता है, उसी प्रकार तुम अपने तेज से इस संसार रूपी जंगल की सभी बाधाओं को समाप्त कर आगे बढ़ो। तुम नर हो, निराश मत होओ।
विशेष:
रूपक अलंकार (‘भव-कानन’, ‘स्वत्त्व-सुधा-रस’)।
मनुष्य के आत्म-गौरव और पौरुष को जाग्रत करने वाला भाव।
5. भाषा एवं व्याकरण ज्ञान
1. कविता के आधार पर तुकांत शब्द :
अर्थ — व्यर्थ
तन — मन
चला — भला
सपना — अपना
तत्व — सत्व / स्वत्त्व
यहाँ — कहाँ
ज्ञान — ध्यान / मान / गान
मान — गान / ध्यान
2. उपसर्ग अलग करो :
व्यर्थ = वि + अर्थ
उपयुक्त = उप + युक्त
सु-योग = सु + योग
सदुपाय = सत् + उपाय
प्रशस्त = प्र + शस्त
अवलम्बन = अव + लम्बन
निराश = निर् + आश (या निः + आश)
3. विलोम शब्द :
निज — पर / पराया
उपयुक्त — अनुपयुक्त
निराश — आशावान / आशान्वित
अपना — पराया
सुधा (अमृत) — गरल / विष
ज्ञान — अज्ञान
मान — अपमान
जन्म — मृत्यु / मरण
4. तीन-तीन पर्यायवाची शब्द :
नर: मानव, मनुष्य, मनुज (इंसान)
जग: संसार, दुनिया, विश्व (जगत, लोक)
अर्थ: धन, मतलब, प्रयोजन (तात्पर्य)
पथ: मार्ग, रास्ता, राह (डगर)
अखिलेश्वर: परमात्मा, ईश्वर, भगवान (जगदीश, परमेश्वर)
5. ‘त्व’ प्रत्यय वाले 10 भाववाचक संज्ञा शब्द :
अमर + त्व = अमरत्व
मनुष्य + त्व = मनुष्यत्व
अपन + त्व = अपनत्व
देव + त्व = देवत्व
पुरुष + त्व = पुरुषत्व
कवि + त्व = कवित्व
महत्व + त्व = महत्व
नारी + त्व = नारीत्व
गुरु + त्व = गुरुत्व
लघु + त्व = लघुत्व
6. परीक्षापयोगी महत्वपूर्ण अतिरिक्त प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1: मैथिलीशरण गुप्त को ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि किस काव्य-ग्रंथ की रचना के बाद प्राप्त हुई ?
उत्तर: मैथिलीशरण गुप्त को सन् 1912 में प्रकाशित उनके प्रसिद्ध राष्ट्रीय काव्य-ग्रंथ ‘भारत-भारती’ की रचना के बाद राष्ट्रकवि की उपाधि प्राप्त हुई।
प्रश्न 2: मैथिलीशरण गुप्त के प्रसिद्ध महाकाव्य का नाम क्या है ?
उत्तर: मैथिलीशरण गुप्त के प्रसिद्ध महाकाव्य का नाम ‘साकेत’ है।
प्रश्न 3: “हम भी कुछ हैं” पंक्ति से कवि का क्या तात्पर्य है ?
उत्तर: इसका तात्पर्य मनुष्य के आत्म-गौरव, आत्म-विश्वास और अपनी असीम क्षमताओं के स्वाभिमानपूर्ण अहसास से है।
प्रश्न 4: ‘नर हो, न निराश करो मन को’ कविता का मूल संदेश क्या है ?
उत्तर: इस कविता का मूल संदेश यह है कि मनुष्य को विफलता से घबराकर कभी निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि आत्म-विश्वास के साथ निरंतर कर्म करते हुए जीवन को सार्थक और अमर बनाना चाहिए।