साखी
■ अभ्यासमाला : सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर
1. सही विकल्प का चयन करो
(क) महात्मा कबीरदास का जन्म हुआ था—
(अ) सन् 1398 में
(आ) सन् 1498 में
(इ) सन् 1598 में
(ई) सन् 1298 में
उत्तर: (अ) सन् 1398 में
(ख) संत कबीरदास के गुरु कौन थे ?
(अ) रामानंद
(आ) वल्लभाचार्य
(इ) रविदास
(ई) तुलसीदास
उत्तर: (अ) रामानंद
(ग) कस्तूरी मृग वन-वन में क्या खोजता फिरता है ?
(अ) जल
(आ) भोजन
(इ) कस्तूरी नामक सुगंधित पदार्थ
(ई) साथी
उत्तर: (इ) कस्तूरी नामक सुगंधित पदार्थ
(घ) कबीरदास के अनुसार वह व्यक्ति पंडित है—
(अ) जो वेद पढ़ता है
(आ) जो पूजा-पाठ करता है
(इ) जो प्रेम का ढाई आखर पढ़ता है
(ई) जो शास्त्र रटता है
उत्तर: (इ) जो प्रेम का ढाई आखर पढ़ता है
(ङ) कवि के अनुसार हमें कल का काम कब करना चाहिए ?
(अ) कल
(आ) आज
(इ) परसों
(ई) कभी नहीं
उत्तर: (आ) आज
2. एक शब्द में उत्तर दो
(क) श्रीमंत शंकरदेव ने अपने किस ग्रंथ में कबीरदास जी का उल्लेख किया है ?
उत्तर: ‘कीर्तन घोषा’ में।
(ख) महात्मा कबीरदास का देहावसान कब हुआ था ?
उत्तर: सन् 1518 में (मगहर में)।
(ग) कवि के अनुसार प्रेमविहीन शरीर कैसा होता है ?
उत्तर: मसान (श्मशान) के समान।
(घ) कबीरदास जी ने गुरु को क्या कहा है ?
उत्तर: कुम्हार।
(ङ) महात्मा कबीरदास की रचनाएँ किस नाम से प्रसिद्ध हुईं ?
उत्तर: ‘बीजक’ (साखी, सबद और रमैनी)।
3. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो
(क) कबीरदास के पालक पिता-माता कौन थे ?
उत्तर: कबीरदास के पालक पिता-माता नीरू और नीमा नामक मुसलमान जुलाहा दंपत्ति थे।
(ख) ‘कबीर’ शब्द का अर्थ क्या है ?
उत्तर: ‘कबीर’ शब्द का अर्थ है— महान, बड़ा या श्रेष्ठ।
(ग) ‘साखी’ शब्द किस संस्कृत शब्द से विकसित है ?
उत्तर: ‘साखी’ शब्द संस्कृत के ‘साक्षी’ (प्रत्यक्ष दृष्टा) शब्द से विकसित हुआ है।
(घ) साधु की कौन-सी बात नहीं पूछी जानी चाहिए ?
उत्तर: साधु की जाति नहीं पूछी जानी चाहिए, केवल उसका ज्ञान पूछा जाना चाहिए।
(ङ) डूबने से डरने वाला व्यक्ति कहाँ बैठा रहता है ?
उत्तर: डूबने से डरने वाला व्यक्ति किनारे पर ही बैठा रह जाता है और कुछ भी हासिल नहीं कर पाता।
4. अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्दों में)
(क) कबीरदास जी की कविताओं की लोकप्रियता पर प्रकाश डालो।
उत्तर: कबीरदास जी की कविताएँ सरल, सजीव और जनभाषा में होने के कारण जन-जन में अत्यंत लोकप्रिय हैं। असम के महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव ने भी अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘कीर्तन घोषा’ में कबीरदास जी का सादर उल्लेख किया है।
(ख) कबीरदास जी के आराध्य कैसे थे ?
उत्तर: कबीरदास जी के आराध्य सर्वव्यापक, निर्गुण, निराकार ‘राम’ थे, जो मंदिर-मस्जिद या तीर्थों में नहीं, बल्कि सृष्टि के प्रत्येक कण और मनुष्य के हृदय में निवास करते हैं।
(ग) कबीरदास जी की काव्य भाषा किन गुणों से युक्त है ?
उत्तर: कबीरदास जी की काव्य भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ या ‘पंचमेल खिचड़ी’ कहा जाता है। इसमें अवधी, ब्रज, भोजपुरी, पंजाबी और राजस्थानी के शब्द घुले-मिले हैं। यह भाषा अत्यंत सशक्त, सहज और हृदयस्पर्शी है।
(घ) ‘तेरा साईं तुझ में, ज्यों पुहुपन में बास’ का आशय क्या है ?
उत्तर: इसका आशय यह है कि जैसे फूलों के भीतर उसकी सुगंध समाई रहती है, ठीक वैसे ही परमात्मा हमारे अंतर्मन में ही विद्यमान हैं; उन्हें बाहर खोजने की आवश्यकता नहीं है।
(ङ) ‘सतगुरु’ की महिमा के बारे में कवि ने क्या कहा है ?
उत्तर: कबीरदास जी कहते हैं कि सद्गुरु की महिमा अनंत और असीम है। वे शिष्य के अज्ञान को दूर कर उसे ज्ञान रूपी दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं और ईश्वर के वास्तविक स्वरूप से मिलाते हैं।
(च) ‘अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट’ का तात्पर्य बताओ।
उत्तर: इसका तात्पर्य है कि गुरु कुम्हार की तरह बाहर से शिष्य के अवगुणों और दोषों को दूर करने के लिए अनुशासन की कठोर चोट करते हैं, पर अंदर से उसे प्रेम और ममता का सहारा भी देते हैं।
5. संक्षेप में उत्तर दो (लगभग 50 शब्दों में)
(क) बुराई खोजने के संदर्भ में कवि ने क्या कहा है ?
उत्तर: कबीरदास जी कहते हैं— “बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।” अर्थात् जब मनुष्य संसार में दूसरों की बुराइयाँ खोजने निकलता है तो उसे कोई बुरा नहीं दिखता, परंतु जब वह निष्पक्ष होकर अपने अंतर्मन की पड़ताल करता है तो उसे समझ आता है कि सबसे अधिक बुराइयाँ और कमियाँ उसके अपने ही भीतर हैं। इसलिए दूसरों की निंदा करने के बजाय आत्मसुधार करना चाहिए।
(ख) कबीरदास जी ने किसलिए मन का मनका फेरने का उपदेश दिया है ?
उत्तर: कबीरदास जी कहते हैं कि हाथ में माला के दाने (मनका) फेरते-फेरते कई युग बीत गए, लेकिन हृदय का कपट, अहंकार और चंचलता दूर नहीं हुई। इसलिए केवल बाहरी दिखावे की माला फेरना व्यर्थ है। सच्ची साधना यह है कि मनुष्य अपने अंतर्मन की वृत्तियों और विचारों को पवित्र बनाए।
(ग) गुरु शिष्य को किस प्रकार गढ़ते हैं ?
उत्तर: कबीरदास जी ने गुरु की तुलना कुम्हार से और शिष्य की तुलना मिट्टी के कच्चे घड़े से की है। जिस प्रकार कुम्हार घड़ा बनाते समय भीतर से हाथ का सहारा देकर बाहर से थपकी की चोट मारता है ताकि घड़ा सुडौल और मजबूत बने, उसी प्रकार गुरु भी शिष्य को सुयोग्य बनाने के लिए बाहर से कठोर अनुशासन रखते हैं पर भीतर से सदैव उसका भला चाहते हैं।
(घ) कोरे पुस्तकीय ज्ञान की निरर्थकता पर कबीरदास जी ने किस प्रकार प्रकाश डाला है ?
उत्तर: कबीरदास जी कहते हैं— “पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।” अर्थात् बड़े-बड़े ग्रंथ और शास्त्र रट लेने से कोई सच्चा ज्ञानी नहीं बन जाता। जो व्यक्ति अपने हृदय में प्रेम, करुणा, मानवता और ईश्वर-भक्ति के ‘ढाई अक्षर’ को आत्मसात कर लेता है, वही संसार में सच्चा विद्वान है।
6. सम्यक् उत्तर दो (लगभग 100 शब्दों में)
(क) संत कबीरदास की जीवन-गाथा पर प्रकाश डालो।
उत्तर: संत कबीरदास भक्तिकाल की निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक और महान समाज-सुधारक कवि थे। उनका जन्म सन् 1398 में काशी में हुआ था। लोककथा के अनुसार, एक विधवा ब्राह्मणी ने लोकलाज के भय से नवजात कबीर को लहरतारा तालाब के किनारे छोड़ दिया था। वहाँ से नीरू और नीमा नामक एक निर्धन जुलाहा दंपति ने उन्हें उठाकर पुत्रवत पाला। कबीरदास जी ने अपने पालक पिता के जुलाहा व्यवसाय को अपनाया और सादा जीवन व्यतीत किया। उन्होंने स्वामी रामानंद जी को अपना गुरु बनाया। कबीरदास जी अनपढ़ थे, किंतु सत्संग और देशाटन से उन्हें अगाध व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने जीवन भर धार्मिक संकीर्णता, पाखंड, छुआछूत और बाह्याडंबरों का कड़ा विरोध किया। सन् 1518 में मगहर में उन्होंने देहत्याग किया।
(ख) भक्त कवि कबीरदास जी का साहित्यिक परिचय दो।
उत्तर: कबीरदास जी ने कभी कलम और कागज नहीं छुआ (“मसि कागद छूयो नहीं, कलम गह्यो नहीं हाथ”), फिर भी उनकी वाणी हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। उनके उपदेशों और साखियों को उनके शिष्यों (मुख्यतः धर्मदास) ने ‘बीजक’ नामक ग्रंथ में संकलित किया, जिसके तीन मुख्य भाग हैं— साखी, सबद और रमैनी। कबीर की भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ या ‘पंचमेल खिचड़ी’ कहा जाता है, जिसमें जनसामान्य की विभिन्न बोलियों के शब्द घुले-मिले हैं। उनकी साखियों में दोहा छंद का प्रयोग हुआ है। उन्होंने प्रतीकों, उपमाओं और रूपकों के माध्यम से गूढ़ आध्यात्मिक सत्यों को अत्यंत सरल भाषा में प्रस्तुत किया। कबीर का साहित्य समाज को एकता, प्रेम और सद्भाव का शाश्वत संदेश देता है।
7. सप्रसंग व्याख्या करो
(क) “जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान। मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥”
संदर्भ: प्रस्तुत साखी हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आलोक (भाग-2)’ में संकलित संत कबीरदास द्वारा रचित ‘साखी’ पाठ से उद्धृत है।
प्रसंग: यहाँ कबीरदास जी ने मनुष्य के बाह्य रूप, रंग और जाति की तुलना में उसके आंतरिक ज्ञान और गुणों को महत्त्व देने की शिक्षा दी है।
व्याख्या: कबीरदास जी कहते हैं कि किसी साधु, संत या विद्वान से मिलते समय उसकी जाति, कुल या धर्म के बारे में नहीं पूछना चाहिए, बल्कि उसके भीतर छिपे ज्ञान और सद्विचारों को ग्रहण करना चाहिए। जिस प्रकार युद्ध में तलवार की धार और उसकी मजबूती की परख की जाती है, उसके म्यान (कवर) की सुंदरता का कोई मोल नहीं होता; उसी प्रकार मनुष्य की वास्तविक पहचान उसके गुणों से होती है, बाह्य जाति या दिखावे से नहीं।
(ख) “जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ। मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ॥”
संदर्भ: प्रस्तुत दोहा संत कबीरदास जी की साखी से लिया गया है।
प्रसंग: इस साखी में कवि ने जीवन में सफलता, ज्ञान और ईश्वर की प्राप्ति के लिए कठिन परिश्रम, साहस और साधना के महत्त्व को दर्शाया है।
व्याख्या: कबीरदास जी कहते हैं कि जो साहसी गोताखोर गहरे पानी में उतरकर खोज करते हैं, वे ही समुद्र के तल से अनमोल मोती प्राप्त कर पाते हैं। इसके विपरीत, जो बेचारा डरपोक केवल डूबने के भय से किनारे पर ही बैठा रह जाता है, उसके हाथ कभी कुछ नहीं लगता। इसी प्रकार जो साधक सांसारिक भय त्यागकर कठिन साधना करता है, वही ईश्वर और सफलता को प्राप्त करता है।
(ग) “जा घट प्रेम न संचरै, सो घट जान मसान। जैसे खाल लोहार की, साँस लेत बिनु प्रान॥”
संदर्भ: प्रस्तुत साखी संत कबीरदास द्वारा विरचित है।
प्रसंग: यहाँ कवि ने मानव जीवन में प्रेम, करुणा और ईश्वर-भक्ति की अनिवार्यता पर बल दिया है।
व्याख्या: कबीरदास जी कहते हैं कि जिस हृदय में प्रेम, संवेदना और परमात्मा के प्रति भक्ति का संचार नहीं होता, वह शरीर जीवित होते हुए भी श्मशान के समान निर्जीव और अपवित्र है। उसकी स्थिति लोहार की उस चमड़े की धौंकनी जैसी होती है, जो निर्जीव होने पर भी साँस (हवा) लेती और छोड़ती प्रतीत होती है, पर वास्तव में उसमें कोई प्राण नहीं होता। प्रेमविहीन मनुष्य का जीवन पूर्णतः व्यर्थ है।
(घ) “काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥”
संदर्भ: प्रस्तुत साखी कबीरदास जी द्वारा रचित अमर दोहों में से एक है।
प्रसंग: इस दोहे में समय के अमूल्य महत्त्व और कार्यों को टालने की बुरी आदत (आलस्य) का त्याग करने की प्रेरणा दी गई है।
व्याख्या: कबीरदास जी उपदेश देते हैं कि जिस कार्य को तुम्हें कल करना है, उसे आज ही पूरा कर लो और जिसे आज करना है, उसे अभी तुरंत कर डालो। मानव जीवन अत्यंत क्षणभंगुर और अनिश्चित है; एक पल में मृत्यु या प्रलय आ सकती है, फिर तुम्हें अपना अधूरा काम करने का अवसर कब मिलेगा? अतः समय का सदुपयोग करते हुए आलस्य छोड़कर तुरंत सत्कर्म में जुट जाना चाहिए।
भाषा एवं व्याकरण-ज्ञान
1. निम्नलिखित तद्भव शब्दों के तत्सम रूप लिखो
मिरग = मृग
पुहुप = पुष्प
सिष = शिष्य
आखर = अक्षर
मसान = श्मशान
परलय = प्रलय
उपगार = उपकार
तीरथ = तीर्थ
2. वाक्यों में प्रयोग करके निम्नलिखित शब्द-युग्मों के अर्थ का अंतर स्पष्ट करो
मनका (माला का दाना): जप करते समय माला का एक मनका टूट गया।
मन का (हृदय/अंतर्मन का): हमें अपने मन का मैल दूर करके ईश्वर का ध्यान करना चाहिए।
करका (ओला / पाला): तेज आँधी और करका गिरने से फसल बर्बाद हो गई।
कर का (हाथ का): कबीर जी कहते हैं कि कर का मनका छोड़कर मन को शुद्ध करो।
नलकी (छोटी नली / धागा लपेटने की रील): सिलाई मशीन की नलकी से धागा खत्म हो गया।
नल की (नल/टोटी से संबंधित): हमारे घर में नल की टोटी से पानी टपक रहा है।
पीलिया (एक रोग / जांडिस): दूषित पानी पीने से उसे पीलिया हो गया।
पी लिया (पीने की क्रिया): प्यासे पथिक ने शीतल जल पी लिया।
तुम्हारे (आपका / सर्वनाम): यह सुंदर उपहार तुम्हारे लिए है।
तुम हारे (पराजित होना): खेल प्रतियोगिता में तुम हारे या जीते, यह महत्त्वपूर्ण नहीं है।
नदी (जलधारा / सरिता): ब्रह्मपुत्र असम की एक विशाल नदी है।
न दी (नहीं दिया): उसने माँगने पर भी मुझे अपनी पुस्तक न दी।
3. निम्नलिखित शब्दों के लिंग निर्धारित करो
महिमा = स्त्रीलिंग (उदा. गुरु की महिमा अनंत है)
चोट = स्त्रीलिंग (उदा. उसे गहरी चोट लगी)
लोचन = पुल्लिंग (उदा. उसके लोचन खुल गए)
तलवार = स्त्रीलिंग (उदा. तलवार की धार तेज है)
ज्ञान = पुल्लिंग (उदा. सच्चा ज्ञान प्राप्त हुआ)
घट = पुल्लिंग (उदा. घट में जल भरा है)
साँस = स्त्रीलिंग (उदा. उसकी साँस चल रही है)
प्रेम = पुल्लिंग (उदा. प्रेम का भाव पवित्र है)
4. निम्नलिखित शब्द-समूहों के लिए एक शब्द लिखो
मिट्टी के बर्तन बनाने वाला व्यक्ति = कुम्हार
जो जल में डुबकी लगाता हो = गोताखोर
जो लोहे के औजार बनाता है = लोहार
सोने के गहने बनाने वाला कारीगर = सुनार
विविध विषयों का गहन ज्ञान रखने वाला व्यक्ति = विद्वान (पंडित)
5. निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखो
साईं: प्रभु, ईश्वर, स्वामी
पानी: जल, नीर, वारि
पवन: वायु, हवा, समीर
फूल: पुष्प, सुमन, कुसुम
सूर्य: रवि, दिनकर, भास्कर
गगन: आकाश, नभ, अंबर
धरती: पृथ्वी, धरा, वसुंधरा